चंद्रमा पुराणों एवम ज्योतिष शास्त्र में


August 20, 2011
चंद्रमा पुराणों एवम ज्योतिष शास्त्र में

MOON

विश्लेष्णात्मक अध्ययन

वेदों में चन्द्र को काल पुरुष का मन कहा गया है | वैदिक साहित्य में सोम का स्थान भी प्रमुख देवताओं में प्राप्त होता है | अग्नि ,इंद्र ,सूर्य आदि देवों के समान ही सोम की स्तुति के मन्त्रों की भी रचना ऋषियों द्वारा की गई है | पुराणों में चंद्रमा से सम्बंधित अनेक कथाओं का वर्णन प्राप्त होता है| |

पुराणों के अनुसार चन्द्र की उत्पत्ति

मत्स्य एवम अग्नि पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी न सृष्टि रचने का विचार किया तो सबसे पहले अपने मानसिक संकल्प से मानस पुत्रों की श्रृष्टि की | उनमें से एक मानस पुत्र ऋषि अत्रि का विवाह ऋषि कर्दम की कन्या अनुसुइया से हुआ जिस से दुर्वासा ,दत्तात्रेय व सोम तीन पुत्र हुए | सोम चन्द्र का ही एक नाम है |
पद्म पुराण में चन्द्र के जन्म का अन्य वृतान्त दिया गया है | ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्र अत्रि को श्रृष्टि का विस्तार करने की आज्ञा दी| महर्षि अत्रि ने अनुत्तर नाम का तप आरम्भ किया | ताप काल में एक दिन महर्षि के नेत्रों से जल की कुछ बूंदे टपक पड़ी जो बहुत प्रकाशमय थीं | दिशाओं ने स्त्री रूप में आ कर पुत्र प्राप्ति की कामना से उन बूंदों को ग्रहण कर लिया जो उनके उदर में गर्भ रूप में स्थित हो गया | परन्तु उस प्रकाशमान गर्भ को दिशाएँ धारण न रख सकीं और त्याग दिया | उस त्यागे हुए गर्भ को ब्रह्मा ने पुरुष रूप दिया जो चंद्रमा के नाम से प्रसिध्ध हुए | देवताओं ,ऋषियों व गन्धर्वों आदि ने उनकी स्तुति की | उनके ही तेज से पृथ्वी पर दिव्य औषधियां उत्पन्न हुई | ब्रह्मा जी ने चन्द्र को नक्षत्र,वनस्पतियों ,ब्राह्मण व तप का स्वामी नियुक्त किया | स्कन्द पुराण के अनुसार जब देवों तथा दैत्यों ने क्षीर सागर का मंथन किया था तो उस में से चौदह रत्न निकले थे | चंद्रमा उन्हीं चौदह रत्नों में से एक है जिसे लोक कल्याण हेतु, उसी मंथन से प्राप्त कालकूट विष को पी जाने वाले भगवान् शंकर ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया | पर ग्रह के रूप में चन्द्र की उपस्थिति मंथन से पूर्व भी सिध्ध होती है | स्कन्द पुराण के ही माहेश्वर खंड में गर्गाचार्य ने समुद्र मंथन का मुहूर्त निकालते हुए देवों को कहा कि -” इस समय सभी ग्रह अनुकूल हैं | चंद्रमा से गुरु का शुभ योग है |तुम्हारे कार्य कि सिध्धि के लिए चन्द्र बल उत्तम है |यह गोमन्त मुहूर्त तुम्हें विजय देने वाला है |” अतः यह संभव है कि चंद्रमा के विभिन्न अंशों का जन्म विभिन्न कालों में हुआ हो | चन्द्र का विवाह दक्ष प्रजापति की नक्षत्र रुपी 27 कन्यायों से हुआ जिनसे अनेक प्रतिभाशाली पुत्र हुए | इन्हीं 27 नक्षत्रों के भोग से एक चन्द्र मास पूर्ण होता है |

चन्द्र का स्वरूप

मत्स्य पुराण के अनुसार चन्द्र गौर वर्ण का ,श्वेत वस्त्र धारी तथा श्वेत अश्वों से युक्त रथ में विराजमान हैं | नारद पुराण में चन्द्र को सुन्दर नेत्रों वाला ,मृदुभाषी ,एवम वात -पित्त प्रकृति का कहा गया है |
ज्योतिष के प्रसिध्ध फलित ग्रंथों के अनुसार चन्द्र वृताकार ,वात -कफ प्रकृति का ,सुन्दर ,मृदु वचन बोलने वाला ,सुन्दर नेत्रों वाला ,गौर वर्ण ,श्वेत वस्त्र धारण करने वाला , विचार शील ,तथा बुध्धि मान है |

चन्द्र की गति

विष्णु पुराण ,गरुड़ पुराण व मत्स्य आदि पुराणों के अनुसार चन्द्र का रथ तीन पहियों वाला है जिसके वाम व दक्षिण भाग में दस अश्व जुते रहते हैं | ध्रुव के आधार पर स्थित उस रथ पर चंद्रमा नागवीथी पर स्थित 27 नक्षत्रों का भोग करते हुए भ्रमण शील रहते हैं |शुक्ल पक्ष के आरम्भ में सूर्य के पर भाग में स्थित चन्द्र का पर भाग दिन के क्रम से पूर्ण होता है | देवताओं द्वारा किये गये अमृत पान से क्षीण चन्द्र को उस समय सूर्य अपनी सुषुम्ना किरणों से परिपूर्ण करते रहते हैं |चन्द्र की कलाएं कृष्ण पक्ष में क्षीण तथा शुक्ल पक्ष में वृद्धि को प्राप्त होती हैं |पूर्णिमा तिथि को पूर्ण चन्द्र के दर्शन होते हैं | कृष्ण पक्ष की द्वितीया से चतुर्दशी तक देवता चन्द्र की अमृतमयी किरणों का पान करते हैं |15 दिन तक देवता , ऋषि व पितर अमृत पान के लिए चन्द्र के निकट रहते हैं |जब दो कला मात्र शेष रहा चन्द्र, सूर्य मंडल में प्रवेश करके उसकी अमा नामक किरण में रहता है तो वह अमावस्या तिथि कहलाती है | उस तिथि में पितृ गण अमृतपान करके एक मास तक संतुष्ट रहते हैं |

चंद्रमा का कारकत्व
पुराणों में ——– मत्स्य पुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने भृगु नंदन और्व को अपनी पूजा अर्चना से प्रसन्न किया तथा युध्ध में सहायता की मांग की | और्व ने उसे एक अग्निमयी माया प्रदान की जिसने देवताओं को संतप्त करना आरम्भ कर दिया | देवेन्द्र के आग्रह पर वरुण ने इस माया को नष्ट करने का संकल्प किया पर चन्द्र को जल का उत्पत्ति स्थान कहते हुए इंद्र को उसकी सहायता लेने के लिए भी कहा |
यद्येशा प्रतितन्त्व्या कर्तव्यों भगवान् सुखी |
दीयतां में सखा शक्र तोय योनिर्निशाकर : ||
इंद्र ने चन्द्र की स्तुति करते हुए उसके कारकत्व का विस्तृत वर्णन किया है जिसका उपयोग ज्योतिशास्त्र में किया जाता है |
त्वमप्रतिमवीर्यश्च ज्योतिषां चेश्वेरश्वर: |
त्वन्म्यं सर्वलोकानां ,रसं,रसविदो विदु : ||
हे चन्द्र ! आप पराक्रमी हैं ,नक्षत्रों के स्वामी हैं तथा रस के रूप में सभी प्राणियों में स्थित हैं |
श्वेतभानुर्हिम तनुर्ज्योतिशाम अधिप : शशि |
अब्द्कृत काल योगात्मा ईज्यो यत्तरसो अव्यय : ||
आपकी किरणें श्वेत वर्ण की है ,देह हिम मयि है ,आप नक्षत्रों के स्वामी है | शश के चिन्ह से युक्त ,संवत्सर के रचयिता ,काल योग स्वरूप तथा रस रूप हैं |
औषधीश: क्रिया योनिरम्भो योनिरनुष्णभाक |
शीतान्शुर मृताधारस्चपल: श्वेत वाहन :| |
आप औषधियों के स्वामी ,क्रिया व जल के उत्पत्ति स्थान ,शीतल ,अमृत के आधार हैं ,आपका वाहन श्वेत रंग का है |
त्वं कान्ति : कान्त वपुषाम ,त्वं सोम : सोम वृत्तिनाम |
सौम्यस्त्वं ,सर्व भूतानां ,तिमिर घंस्वगृक्षराट ||
आप ही सब में कान्ति हैं ,सौम्य हैं ,तिमिर नाशक हैं व नक्षत्रों के राजा हैं |
देवराज इंद्र की स्तुति से प्रसन्न हो कर चंद्रमा ने हिम वर्षा की जिस से अग्नि माया नष्ट हो गयी तथा देवताओं की विजय हुई |
ज्योतिष शास्त्र में भी चन्द्र को नक्षत्रों का स्वामी ,हिम के समान श्वेत वर्ण का ,नर -नारियों में मृदुता व कान्ति के रूप में , औषधियों का स्वामी ,शीतल , संवेदनशील ,रसीले पदार्थों का स्वामी ,सौम्य ,एवम जल का स्वामी कहा गया है | जन्म लग्न में शुक्ल पक्ष का चन्द्र हो तो जातक सौम्य व शीतल स्वभाव का होता है यह प्रत्यक्ष देखने में आता है | चन्द्र कल्पना , कृषि ,श्वेत पदार्थ ,स्त्री एवम मन का स्वामी भी है |

चन्द्र की कलाओं में वृद्धि व ह्रास क्यों ?                                                                                                                                                                                                                                     चन्द्र की कलाओं में वृद्धि व ह्रास क्यों होता है ,इसका कारण पुराणों में उपलब्ध है| अत्रिनंदन चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की सताईस नक्षत्र रुपी कन्याओं से हुआ | चन्द्र एक महीने में इन्हीं नक्षत्र रुपी पत्नियों का भोग करते हैं| चन्द्र का रोहिणी पर अधिक प्रेम रहता था | ध्यान देने योग्य है कि ज्योतिष शास्त्र में भी चन्द्र वृष राशि में उच्च का कहा गया है जिसमें रोहिणी नक्षत्र के चारों चरण आते हैं| रोहिणी पर चन्द्र का विशेष प्रेम उसकी बहनों को अच्छा नहीं लगा और उन्हों ने पिता दक्ष से हस्तक्षेप करने कि प्रार्थना की |
दक्ष ने चन्द्र को समझाने की चेष्टा की पर चन्द्र पर इसका तनिक भी असर नहीं हुआ | क्रोधित हो कर दक्ष ने अपने दामाद सोम को क्षय रोग से ग्रस्त होने का शाप दे दिया | चन्द्र के पश्चाताप करने पर तथा अपने अपराध को स्वीकार करने पर उसकी पत्नियों ने उसको क्षमा कर दिया तथा अपने पिता दक्ष से भी क्षमा करने की विनती की| शाप को पूरी तरह से वापिस लेने में असमर्थता जता करदक्षने चंद्रमा की कलाओं को पंद्रह दिन क्षय तथा पंद्रह दिन वृद्धि होने का वर दे दिया | तभी से कृष्ण पक्ष में पंद्रह दिन चन्द्र की कलाओं में ह्रास तथा शुक्ल पक्ष में पंद्रह दिन वृद्धि होती है |शुभ कार्यों के आरम्भ में शुक्ल पक्ष का चन्द्र प्रशस्त माना जाता है |

ज्योतिष शास्त्र में चन्द्र

चन्द्र की गति सभी ग्रहों से अधिक है इस लिए इसे मनुष्य का मन कहा गया है | चन्द्र एक राशि में 2-1/4 दिन संचार करता है | इस की पृथ्वी से दूरी 384000 कि० मी ०  तथा व्यास 3480 कि ० मी ० है |यह 29-1/2 दिन में पृथ्वी कि परिक्रमा कर लेता है जिसे चन्द्र मास कहते हैं तथा जिसके 15-15 दिन के दो पक्ष शुक्ल एवम कृष्ण होते हैं | चन्द्र कि राशि  कर्क है | यह वृष में उच्च व मूल त्रिकोण  तथा वृश्चिक में नीच  का होता है |चन्द्र कर्क तथा वृष राशि में ,शुक्ल पक्ष में ,सोमवार में ,अपने द्रेष्काण होरा तथा नवांश में ,रात्रिकाल में ,चतुर्थ  भाव में ,दक्षिणायन में ओर वायव्य दिशा में बलवान होता है |

चन्द्र के रोग

चंद्रमा जन्मकुंडली में नीच या शत्रु राधि का ,छटे -आठवें -बारहवें  भाव में स्थित हो ,पाप ग्रहों से युत  या दृष्ट हो  तो मनोविकार ,चिंता ,नेत्र दोष ,जलोदर ,नजला जुकाम व खांसी ,कामला ,क्षय रोग, अरुचि व मूत्रकृच्छ आदि रोग उत्पन्न करता है |

फल देने का समय

चन्द्र अपना शुभाशुभ फल  24-26 वर्ष कि आयु में एवम अपनी दशाओं व गोचर में प्रदान करता है |शिशु अवस्था पर भी  इस का अधिकार कहा गया है|

चन्द्र का राशि फल

जन्म कुंडली में चन्द्र का मेषादि राशियों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :-

मेष में चन्द्र हो तो जातक लाल नेत्रों वाला ,गर्म तथा अल्प भोजन करने वाला ,जल्दी प्रसन्न होने वाला ,भ्रमणशील ,कामी ,अस्थिर धन वाला ,शूर ,स्त्रियों को प्रिय ,खराब नख वाला ,अभिमानी ,व्रण युक्त मस्तक वाला ,चंचल प्रकृति का ,जल से भय करने वाला ,कमजोर घुटने वाला तथा क्रोध करने वाला होता है |

 वृष   में  चन्द्र हो तो जातक अभिमानी ,अल्पभाषी ,भाग्यवान ,तेजस्वी ,बहुभोजी ,विशाल छाती वाला ,दानी ,सुन्दर ,कन्या सन्तिति वाला ,क्षमा शील ,मध्य व अंतिम समय में सुखी ,मोटी जांघ व मोटे मुख वाला ,भारी गर्दन वाला ,दुःख व क्लेश सहन क्र लेने वाला ,सब को प्रिय ,स्थिर मित्रों वाला होता है |

मिथुन में चन्द्र हो तो जातक  ऊँची नाक तथा काले नेत्रों वाला ,कला का ज्ञाता ,काव्य कर्ता,विषय सुख में लीन,तीव्र बुध्धि का  नसों से युक्त ,सुंदर ,सौभाग्यवान ,हास्य प्रिय , दूत कर्म करने वाला ,चतुर ,मीठी वाणी से युक्त ,स्त्री के वश में ,लंबी देह वाला होता है |

कर्क में चन्द्र हो तो जातक शीघ्र चारी ,प्रेम वश स्त्रियों के अधीन ,अच्छे मित्रों से युक्त ,छोटा शरीर ,मोटे गले वाला ,बगीचे तथा जलाशय से प्रेम करने वाला ,ज्योतिष ज्ञान का ज्ञाता ,नम्र ,सत्यवक्ता ,प्रवासी ,अधिक बालों वाला , कभी वृद्धि व  कभी हानि से युक्त होता है |

सिंह में चन्द्र हो तो जातक पुष्ट हड्डी वाला ,अल्प रोम वाला ,छोटी पीली आँखों वाला ,भूख प्यास उदर व दांत के रोग से पीड़ित ,मांस भोजी ,उग्र ,दानी ,पुत्रहीन या अल्प पुत्र वाला ,वन व पर्वत का प्रेमी ,माता का भक्त ,वीर ,गंभीर दृष्टि वाला ,स्त्री से द्वेष करने वाला ,क्रोधी ,स्थिर मति वाला होता है

कन्या में चन्द्र हो तो जातक लज्जाशील ,मनोहर दृष्टि वाला ,सुखी ,कलाओं में निपुण ,धर्मात्मा ,बुध्धिमान ,सुरतप्रिय,परगृह व वित्त से युक्त ,कोमल वचन बोलने वाला ,अधिक कन्या से युक्त होगा |

तुला मे चन्द्र हो तो जातक देव ब्राह्मण साधु कि पूजा करने वाला ,स्त्रीजित ,ऊँची नाक वाला, पतले व चंचल शरीर वाला ,क्रय विक्रय में चतुर ,बधुओं का उपकार करने वाला पर उनसे फिर भी तिरस्कार पाने वाला होगा|

वृश्चिक में चन्द्र हो तो जातक बड़े नेत्र व छाती वाला ,बाल्यावस्था में व्याधि से युक्त ,लोभी ,नास्तिक ,रजा के द्वारा नष्ट धन वाला कठोर स्वभाव वाला तथा छिप कर पाप करने वाला होगा |

धनु में चन्द्र हो तो जातक वह लंबे मुख तथा ग्रीवा से युक्त ,पिता के धन से युक्त ,दानी , कवि, वक्ता ,मोटे दांत ओर बड़े कान वाला ,छोटे कन्धों वाला ,प्यार से वश में आने वाला  होगा |

मकर में चन्द्र हो तो जातक अपनी स्त्री व पुत्रों को बहुत प्यार करने वाला , कमर से नीचे दुर्बल ,सुंदर नेत्र ,पतली कमर वाला ,बड़ों का उपदेश मानने वाला ,सौभाग्यशाली , अल्प उत्साही ,धार्मिक ,सत्य वादी ,आलसी ,सर्दी को सहन न करने वाला ,भ्रमणशील व लोभी होगा |

कुम्भ में चन्द्र हो तो जातक लंबी गर्दन ,रुखा व अधिक  रोम युक्त शरीरवाला ,नस प्रधान ,लंबा कद ,पाप कर्म व पराये धन  में आसक्त ,धर्म रहित ,दुष्ट स्वभाव का ,दुखी व जीवन में उतार -चढ़ाव से युक्त होता है |

मीन में चन्द्र हो तो जातक दूसरों के धन का भोगी ,सम व सुन्दर शरीर वाला ,उठी हुई नाक वाला ,स्त्री के वश में ,पंडित , उत्तम स्वभाव का ,गान विद्या का प्रेमी ,रजा का नौकर ,कान्ति युक्त तथा जल या जलोत्पन्न पदार्थों से आजीविका चलने वाला होता है | 

चन्द्र का सामान्य  दशा फल

जन्म कुंडली में चन्द्र स्व ,मित्र ,उच्च राशि -नवांश का ,शुभ भावाधिपति ,षड्बली ,शुभ युक्त -दृष्ट हो तो चन्द्र की शुभ दशा में समस्त कार्यों की सिध्धि ,मन में खुशी ,घर में सुख ,स्त्री व संतान सुख ,कृषि से लाभ ,घर में मंगल कार्य ,राज सहयोग ,भाग्योथान , विद्या लाभ ,व्यवसाय में सफलता ,पद प्राप्ति व पदोन्नति ,विदेश यात्रा ,गीत -संगीत -अभिनय आदि कलात्मक कार्यों में रूचि ,कल्पनाशीलता ,जलोत्पन्न, तरल व श्वेत पदार्थों के कारोबार से व खेल कूद से धन  लाभ,पर्यटन तथा स्वभाव में नम्रता होती है |जिस भाव का स्वामी चन्द्र होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में सफलता व लाभ होता है |

                               यदि चन्द्र कृष्ण पक्षीय ,नीच शत्रु राशि नवांश का ,षड्बल विहीन ,अशुभभावाधिपति  पाप युक्त दृष्ट हो तो चन्द्र दशा में निद्रा व आलस्य का अधिक प्रभाव ,स्व जनों से वैर ,मानसिक विकलता ,जल से भय ,अरुचि ,नजला जुकाम खांसी का रोग ,परिवार में कलह , कन्या का जन्म ,चित्त में चंचलता ,अस्थिरता ,मित्रों से अनबन होती है |  जिस भाव का स्वामी चन्द्र होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में असफलता व हानि होती है |

गोचर में चन्द्र

जन्मकालीन चन्द्र से 1,3,6,7,10,11 वें स्थान पर गोचर वश भ्रमण करने पर चंद्रमा शुभ फल प्रदान करता है |

जन्मकालीन चन्द्र से प्रथम स्थान पर चन्द्र का गोचर सुख आनंद ,उत्तम भोजन ,वस्त्र , अच्छा स्वास्थ्य व उपहार प्राप्ति करता है |

               दूसरे स्थान पर चन्द्र का गोचर नेत्र दोष ,विद्या हानि ,परिवार में मतभेद ,कुभोजन व असफलता दिलाता है |

               तीसरे स्थान पर चन्द्र का गोचर  धन लाभ, शुभ समाचार प्राप्ति कराता है मन प्रसन्न रहता है भाग्य अनुकूल रहता है| 

               चौथे स्थान पर चन्द्र का गोचर स्वजनों से विवाद ,सुख हीनता ,छाती में कफ विकार ,जल से भय करता है |

               पांचवें स्थान पर चन्द्र का गोचर मन में अशांति ,उदर विकार,संतान कष्ट ,विद्या में असफलता करता है | 

               छ्टे स्थान पर चन्द्र का गोचर धन लाभ ,उत्तम स्वास्थ्य ,शत्रु पराजय ,मातुल पक्ष से लाभ करता है

               सातवें स्थान पर चन्द्र के  गोचर से  काम सुख ,यात्रा ,व्यापार में लाभ ,शीतल पेय ,आर्थिक लाभ होता है |

              आठवें स्थान पर चन्द्र के गोचर से कफ रोग ,विवाद ,मानसिक कष्ट ,पाचन हीनता व् जल से भय होता है |
              नवें  स्थान पर चन्द्र के  गोचर से  संतान कष्ट ,भाग्य की विपरीतता ,सरकार की और से परेशानी होती है |
              दसवें  स्थान पर चन्द्र के  गोचर से अभीष्ट सिध्धि ,सरकार से लाभ और सहयोग ,सम्मान ,पद लाभ होता है |
              ग्यारहवें स्थान पर चन्द्र के गोचर से आय वृध्धि ,व्यापार में लाभ ,मित्र सुख ,श्वेत एवम तरल पदार्थों से लाभ होता है |
              बारहवें   स्थान पर चन्द्र के  गोचर से  अपव्यय ,शारीरिक कष्ट ,मानसिक चिंता होती है तथा किसी गलत कार्य में रूचि होती है |

चन्द्र शान्ति के उपाय
जन्मकालीन चन्द्र निर्बल होने के कारण अशुभ फल देने वाला हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है |
रत्न धारण – श्वेत तथा गोल मोती चांदी की अंगूठी में रोहिणी ,हस्त ,श्रवण नक्षत्रों में जड़वा कर सोमवार या पूर्णिमा तिथि में पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की अनामिका या कनिष्टिका अंगुली में धारण   करें | धारण करने से पहले ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप ,पुष्प ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |
दान
व्रत ,जाप -   सोमवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः मन्त्र का ११००० संख्या में जाप करें |सोमवार को चावल ,चीनी ,आटा, श्वेत वस्त्र ,दूध दही ,नमक ,चांदी  इत्यादि का दान करें |
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सूर्य पुराणों एवम ज्योतिष शास्त्र में


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Monday, June 13, 2011

सूर्य पुराणों एवम ज्योतिष शास्त्र में

सूर्य  पुराणों एवम ज्योतिष शास्त्र में

                                    विश्लेष्णात्मक अध्ययन 

वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है |.समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है |सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है| वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है| वेदों की   ऋचाओं में अनेक स्थानों पर  सूर्य देव की स्तुति की गई  है |  पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति ,प्रभाव ,स्तुति मन्त्र इत्यादि का वर्णन है | ज्योतिष शास्त्र में नव ग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है | प्रस्तुत लेख में सूर्य का पुराणों एवम ज्योतिष साहित्य के आधार पर तुलनात्मक अध्ययन किया गया है |
सूर्य देव की उत्पत्ति
मार्कंडेय पुराण के अनुसार  पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था | उस समय कमलयोनि ब्रह्मा  जी प्रगट हुए | उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था | तत्पश्चात ब्रह्मा  जी के चार मुखों से चार वेद प्रगट हुए जो  ॐ के तेज में एकाकार हो गये |
यह वैदिक तेज ही  आदित्य है जो विश्व का अविनाशी कारण है|  ये वेद स्वरूप सूर्य ही श्रृष्टि की उत्पत्ति ,पालन व संहार के  कारण हैं | ब्रह्मा  जी की प्रार्थना पर सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को ही धारण किया |

 सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा  जी के पुत्र मरीचि हुए जिनके पुत्र  ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ | अदिति ने घोर तप द्वारा भगवान् सूर्य को प्रसन्न  किया जिन्होंने उसकी इच्छा पूर्ति के लिए सुषुम्ना नाम की किरण से उसके गर्भ में प्रवेश  किया | गर्भावस्था में भी अदिति चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती थी | ऋषि राज कश्यप ने क्रोधित हो कर अदिति से कहा – ” तुम इस तरह उपवास रख कर गर्भस्थ शिशु को क्यों मरना चाहती हो | ” यह सुन कर देवी अदिति ने  गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था |भगवान् सूर्य शिशु रूप में उस गर्भ से प्रगट हुए | अदिति को मारिचम – अन्डम कहा जाने के कारण यह बालक मार्तंड नाम से प्रसिद्ध हुआ | ब्रह्म  पुराण  में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को  विवस्वान कहा गया है |
सूर्य का स्वरूप एवम प्रकृति

मत्स्य पुराण के अनुसार सूर्य  कमलासन पर विराजमान हैं | उनकी कांति कमल के भीतरी भाग जैसी है | वे सात अश्वों के रथ पर आरूढ़   हैं जो सात ही रज्जुओं से बंधे हुए हैं |
ब्रह्म पुराण के अनुसार भी  सूर्य  कमलासन पर विराजमान हैं | उनके नेत्र पीले हैं तथा शरीर का वर्ण लाल है | उनका रूप तेजस्वी है तथा वस्त्र कमल के समान लाल हैं |
ज्योतिष शास्त्र के प्रसिद्ध फलित ग्रंथों के अनुसार सूर्य पित्त प्रधान ,चतुरस्र देह ,अल्पकेशी, पिंगल दृष्टि ,लाल वर्ण ,तीक्ष्ण ,शूर एवम अस्थि प्रधान है |

सूर्य  का  रथ एवम गति
 देवी भागवत ,मत्स्य ,नारद ,ब्रह्माण्ड एवम गरुड़ आदि पुराणों   के अनुसार  सूर्य के रथ में एक चक्र है जिसकी तीन पूर्वान्ह ,मध्यान्ह व अपरान्ह रुपी नाभियाँ हैं |परिवत्सरादिक पांच अरे हैं | छः वसंत आदि ऋतु रुपी नेमियाँ हैं | अक्षय स्वरूपी संवत्सर  से युक्त उस चक्र में सम्पूर्ण कालचक्र स्थित है | दिन को रथ की नाभि कहा गया है | वर्ष उसके अरे हैं |चारों युग इसके धुरे के छोर हैं |पवन  वेगी अश्वों से जुते इसी रथ पर सूर्य देव आकाश मंडल में भ्रमण करते हैं | राशि चक्र में सिंह राशि पर इनका अधिकार है |

          कुम्हार के चाक के सिरे पर घूमते हुए जीव के समान भ्रमण करता  हुआ सूर्य पृथ्वी  के तीस भागों का एक दिन रात में अतिक्रमण करता है |उत्तरायण के आरम्भ में मकर राशि में प्रवेश  करता हैतो इसकी गति मंद हो जाती है | कर्क राशि में प्रवेश करने पर ये दक्षिणायन हो जाते हैं | जब सूर्य मेष एवम तुला राशि में होते हैं तो उस समय दिन एवम रात्रि का मान समान होता है | वृष आदि पांच राशियों में सूर्य भ्रमण के समय दिनमान में वृद्धि तथा रात्रिमान में कमी एवम वृश्चिक आदि पांच राशियों में  सूर्य भ्रमण के समय दिनमान  में कमी तथा रात्रिमान में वृद्धि होती है |
              उदय से ले कर सूर्य की गति के तीन मुहूर्त के समय को प्रातःकाल कहते हैं | इस से आगे के तीन तीन मुहूर्त का समय क्रमशः संगव  ,मध्यान्ह ,अपरान्ह ,एवम सांयकाल होता है |सूर्य की दो घडी की गति का परिमाण 3150000  योजन से अधिक है | उत्तर दिशा में सूर्य मार्ग को नागवीथि तथा दक्षिण दिशा में  अजवीथि  कहा जाता है | सम्पूर्ण दिन रात्रि में तीस मुहूर्त होते हैं | शरद व वसंत ऋतु  में जब सूर्य तुला व मेष राशि में संचार करता है उसे विषुव काल कहते हैं | इस काल में 15 मुहूर्त दिन में तथा 15 मुहूर्त रात में होने के कारण दिन व रात का मान समान होता है | विषुव काल को  अति पवित्र कहा गया है | इस समय देवता ,ब्राह्मण एवम पितृगण  के निमित्त  किया गया दान अक्षय होता है |  विष्णु पुराण के अनुसार सूर्य ही समस्त  वृष्टियों का मूल कारण है | सूर्य समस्त लोकों के समुद्रों ,सरोवरों ,नदियों व स्थावर -जंगम  प्राणियों में स्थित जल को अपनी किरणों द्वारा खींचते रहते हैं | यह जल मेघों में प्रवर्तित  होता रहता है | मेघ वायु द्वारा प्रेरित हो कर पृथ्वी पर जल की वृष्टि करते हैं जिस से अन्न की उत्पत्ति होती है और अन्न से ही सम्पूर्ण जगत का पोषण होता है |
सूर्य का कारकत्व
 पुराणों के अनुसार सभी प्राणियों की आत्मा सूर्य ही है | इन्द्रियों में नेत्रों का स्वामी सूर्य है | नेत्रों में कष्ट होने पर सूर्य स्तोत्र का पाठ करना कहा गया है |
ज्योतिष  शास्त्र में  सूर्य को आत्मा ,नेत्र ,पिता ,प्रताप ,आरोग्यता ,लाल  रंग के पदार्थ  ,अस्थि ,सिर ,हृदय ,उदर,महत्वकांक्षा ,राजनीति ,राजा इत्यादि का कारक कहा गया है |
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य आकाश में स्थित क्रान्ति वृत्त के राशि चक्र में एक दिन में लगभग एक अंश की गति से भ्रमण करता है | यह सदैव मार्गी होता है | यह सिंह राशि का स्वामी है जिसमें 1-20 अंश तक मूल त्रिकोण तथा 21-30 अंश तक स्व राशि में समझा जाता है | सूर्य मेष राशि के 1 अंश से 9 अंश तक उच्च तथा 10 अंश पर परम उच्च होता है | तुला राशि में 1-9 अंशों तक नीच तथा 10 अंश पर परम नीच का होता है | सूर्य अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है | चन्द्र ,मंगल गुरु  सूर्य के मित्र ,बुध सम , शनि व शुक्र शत्रु हैं | सूर्य द्वारा एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्रांति कहा जाता है | वर्ष में बारह संक्रांतियां होती हैं | सूर्य संक्रांति से 16 घटी पहले तथा 16 घटी बाद में पुण्य काल  होता है जो दान ,जाप ,उपासना, होम इत्यादि धार्मिक कार्यों के लिए उत्तम कहा गया है |

              सूर्य का निसर्ग बल नव ग्रहों  में सबसे अधिक है | उत्तरायण में ,अपने वार- होरा -नवांश में ,स्व -मित्र-मूल त्रिकोण  -उच्च राशि में , वर्गोत्तम नवांश में, दिन के मध्य में तथा लग्न से दशम स्थान पर  सूर्य सदा बली एवम शुभ फलदायक होता है |  सूर्य से पहले स्थित ग्रह अधोमुखी हो कर अशुभ तथा बाद में उर्ध्वमुखी हो कर शुभ फल देने वाले होते हैं |
 सूर्य और रोग
जन्म कुंडली में सूर्य यदि नीच -शत्रु राशिस्थ ,पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो कर त्रिक में हो तो नेत्र कष्ट ,हृदय रोग ,सिर में  पीड़ा या रोग ,पित्त जनित विकार ,अस्थि रोग ,ज्वर इत्यादि रोग प्रदान करता है |
सूर्य का राशि फल
जन्म कुंडली में मेष आदि राशियों में सूर्य का सामान्य  फल इस प्रकार है ——–
मेष  सूर्य की उच्च राशि है | इसमें स्थित होने पर जातक धनी,साहसी ,उग्र ,ऊँचे चरित्र का अपने कार्यों से प्रतिष्ठा पाने वाला , मजबूत  अस्थियों   वाला तथा  कला  में रूचि रखने वाला होता है |
वृष  राशि में स्थित होने पर जातक सुगंध प्रेमी ,गीत -संगीत को जानने वाला ,मुख -नेत्र रोग से पीड़ित ,व्यापारी एवम स्त्रियों से शत्रुता रखने वाला होगा |
मिथुन  राशि में स्थित होने पर जातक ज्योतिष  शास्त्र का ज्ञाता ,धनवान ,मेधावी ,विज्ञान में निपुण ,विनीत , उदार तथा बंधु प्रिय  होता है |
कर्क  राशि में स्थित होने पर जातक  मीठी वाणी का ,चतुराई से बोलने वाला ,सुरूप , दूसरों के कार्य करने वाला तथा यात्रा में क्लेश उठाने वाला होता है |
 सिंह राशि में स्थित होने पर जातक  शत्रु हन्ता ,वन पर्वत में भ्रमण में रूचि रखने वाला ,तेजस्वी ,धनी ,विख्यात ,स्थिर विचारों का ,गंभीर तथा क्रोधी होता है |
 कन्या राशि में स्थित होने पर जातक  दुबला ,अल्प बली, सरल ,लज्जा युक्त ,मेधावी ,तथा कोमल स्वभाव का होता है |
तुला राशि में स्थित होने पर जातक  पराजित ,द्वेषी ,निर्धन ,परकार्य रत ,मलिन ,ढीठ ,निम्न कार्य करने वाला ,मद्य विक्रेता ,रोगी ,व्यसनों  से पीड़ित होता है |

वृश्चिक राशि में स्थित होने पर जातक  शत्रुजित,राजा की कृपा से सुख प्राप्त करने वाला ,वैदिक धर्म का आचरण करने वाला ,स्त्री को प्रिय ,धनी ,कठोर स्वभाव का तथा शस्त्र चलाने में निपुण  होगा |

धनु राशि में स्थित होने पर जातक  राजा का कृपा पात्र  ,पंडित ,व्यवहार कुशल ,चतुर ,आयुर्वेद या शिल्प विद्या का ज्ञाता ,धनवान तथा बंधु हितकारी होगा |

मकर राशि में स्थित होने पर जातक  विपत्तियों से घिरा हुआ ,अशुभ कार्य करने वाला ,,सज्जनों का शत्रु ,लोभी ,चच्चल ,अधिक भोजन करने वाला तथा बंधु हीन होगा |

 कुम्भ राशि में स्थित होने पर जातक स्थिर द्रोही ,कोपी ,विरोध करने को तत्पर ,व्ययी ,अनिश्चित ,पापी ,कृतघ्न ,दूषित कार्य करने वाला ,भाग्य हीन ,हृदय रोगी ,अविश्वसनीय मित्र ,चुगली करने वाला तथा दुखीहोगा |मीन राशि में स्थित होने पर जातक पुण्यवान ,गुरु व मित्र में प्रीति करने वाला ,प्रसन्न चित्त ,धार्मिक ,स्त्री से पूजित ,जलोत्पन्न पदार्थों का व्यापार करने वाला होगा |
दशा फल एवम समय

सूर्य जन्म कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार अपना  शुभाशुभ फल अपनी दशाओं में प्रदान करता है | सर्व प्रचलित विंशोत्तरी दशा के अनुसार सूर्य की महादशा 6 वर्ष की होती है |दूसरे ग्रहों की महादशाओं में अपनी अन्तर्दशा आने पर भी सूर्य का शुभाशुभ फल मिलता है | जन्म कुंडली में सूर्य शुभ फल दायक सिध्ध होता हो तो उसकी  दशा  में यश वृध्धि ,स्वर्ण लाभ ,पिता एवम राजा से लाभ ,उद्योगशीलता ,राज सम्मान ,प्राकृतिक स्थलों पर भ्रमण होगा |यदि  अशुभ  फल देने वाला हो तो ज्वर ,सिर पीड़ा ,नेत्र कष्ट ,पित्त की अधिकता , क्रोध ,पिता को कष्ट ,राजा से हानि ,धन व यश की हानि ,हृदय रोग ,एवम कलह क्लेश होगा | 22-24 वर्ष की अवधि में भी सूर्य का शुभाशुभ फल मिलता है |
गोचर  में  सूर्य
जन्मकालीन चन्द्र से 3,6,10,11 वें स्थान पर गोचर वश जाने पर सूर्य शुभ फल प्रदान करता है | क्रमानुसार 9,12,4,5 वां इनका  वेध स्थान है जहां किसी ग्रह के स्थित होने पर सूर्य का शुभ फल नहीं मिलता | सूर्याष्टक वर्ग में जिन राशियों में चार से अधिक शुभ बिंदु प्राप्त हैं उनमें गोचर वश जाने पर सूर्य का शुभ फल प्राप्त होगा | यह गोचर प्रभाव जानने  की  अधिक सूक्ष्म विधि है |
रत्न एवम धातु
सूर्य की धातु ताम्बा है | माणिक्य सूर्य का रत्न  तथा  लालडी उपरत्न है |  सूर्य यदि  अशुभ  फल देने वाला हो तो ताम्बे या सोने में माणिक्य या लालडी  सूर्य के नक्षत्रों –कृतिका,उत्तरा फाल्गुनी व उत्तराषाढ़ में जडवा कर    रविवार को धारण करना चाहिए |
 दान ,जाप व व्रत
रविवार को सूर्योदय के बाद गेंहु,गुड ,केसर ,लाल चन्दन ,लाल वस्त्र ,ताम्बा, सोना  तथा लाल रंग के फल दान करने चाहियें | सूर्य के बीज मन्त्र ॐ  ह्रां ह्रीं ह्रों सः सूर्याय नमः  के 7000 की संख्या में जाप करने  से भी सूर्य कृत अरिष्टों की निवृति हो जाती है | गायत्री जाप से , रविवार के मीठे व्रत रखने से तथा ताम्बे के पात्र में जल में  लाल चन्दन ,लाल पुष्प ड़ाल कर नित्य सूर्य को अर्घ्य  देने पर भी शुभ  फल प्राप्त होता है |  विधि पूर्वक बेल पत्र की जड़ को रविवार में लाल डोरे में धारण करने से भी सूर्य प्रसन्न हो कर शुभ फल दायक हो जाते हैं  |

गण्डमूल नक्षत्र



 गण्डमूल नक्षत्र
पुराणों में गण्डमूल नक्षत्र
पुराणों में अनेक स्थानों पर गंडांत नक्षत्रों का उल्लेख किय गया है |   रेवती नक्षत्र की अंतिम चार घड़ियाँ ,अश्वनी नक्षत्र की पहली चार घड़ियाँ गंडांत कही गई हैं | मघा ,आश्लेषा ,ज्येष्ठा एवम मूल नक्षत्र भी गंडांत हैं | विशेषतः ज्येष्ठा तथा मूल के मध्य का एक प्रहर अत्यंत अशुभ फल देने वाला है | इस अवधि में उत्पन्न बालक /बालिका व उसके माता -पिता को जीवन का भय होता है | गंडांत नक्षत्रों  को सभी शुभ कार्यों में त्याग देना चाहिए | 28 वें दिन उसी नक्षत्र में गण्डमूल दोष की शांति कराने पर दोष की निवृति हो जाती है |
स्कन्द पुराण  के काशी खंड में सुलक्षणा नाम की कन्या का वर्णन है जिसका जन्म मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में हुआ था  तथा उस बाला के माता -पिता  दोनों का देहांत उस के जन्म  के कुछ समय के बाद ही हो गया था | नारद पुराण  के अनुसार मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण को छोड़ कर शेष चरणों में तथा ज्येष्ठा नक्षत्र के अंतिम चरण में  उत्पन्न संतान विवाहोपरांत अपने ससुर के लिए घातक होती है | ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न कन्या अपने जेठ के लिए  तथा विशाखा में उत्पन्न कन्या अपने देवर के लिए  अशुभ फल का संकेत कारक होती है |दिन में गंडांत नक्षत्र में उत्पन्न संतान पिता को रात्रि में माता को व संध्या काल में स्वयम को कष्ट कारक होता है |
ज्योतिष शास्त्र  में गण्डमूल नक्षत्र
फलित ज्योतिष के  जातक पारिजात ,बृहत् पराशर होरा शास्त्र ,जातकाभरणं इत्यादि सभी   प्राचीन ग्रंथों में गंडांत नक्षत्रों तथा उनके प्रभावों का वर्णन दिया गया है |अश्वनी ,आश्लेषा ,मघा ,ज्येष्ठा ,मूल तथा रेवती  नक्षत्र  गण्डमूल नक्षत्र हैं |
अश्वनी  नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो पिता को कष्ट तथा अन्य चरणों में शुभ होता है |
आश्लेषा  नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो शुभ ,दूसरे में धन हानि ,तीसरे में माता को कष्ट तथा चौथे में पिता को कष्ट होता है |यह फल पहले दो  वर्षों में ही मिल जाता है
मघा     नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो माता के पक्ष को हानि ,दूसरे में पिता को कष्ट तथा अन्य चरणों में शुभ होता है |
ज्येष्ठा नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो बड़े भाई को कष्ट ,दूसरे में छोटे भाई को कष्ट, तीसरे में माता को कष्ट तथा चौथे में पिता को कष्ट होता है| यह फल पहले वर्ष में ही मिल जाता है | 

ज्येष्ठा नक्षत्र एवम मंगलवार के योग में उत्पन्न कन्या अपने भाई के लिए घातक होती है |  
मूल नक्षत्र के पहले चरण  में जन्म हो तो पिता को कष्ट दूसरे में माता को कष्ट तीसरे में धन हानि तथा चौथे में शुभ होता है | मूल नक्षत्र व रवि वार के योग में उत्पन्न कन्या अपने ससुर का नाश करती है |यह फल पहले चार वर्षों में ही मिल जाता है
जातकाभरणं के अनुसार जन्म के समय  मूल नक्षत्र हो तथा कृष्ण  पक्ष की ३ ,१० या शुक्ल पक्ष की १४ तिथि हो एवम मंगल ,शनि या बुधवार हो तो सारे कुल के लिए अशुभ होता है |मूल नक्षत्र के साथ राक्षस ,यातुधान ,पिता ,यम व काल नामक मुहुर्तेशों  के काल में जन्म हो तो गण्डमूल दोष का प्रभाव अधिक विनाशकारी होता है |
 रेवती नक्षत्र के चौथे चरण  में जन्म हो तो माता -पिता के लिए अशुभ तथा अन्य चरणों में शुभ होता है |
अभुक्त मूल  ज्येष्ठा नक्षत्र की अंतिम दो घटियाँ तथा मूल नक्षत्र की आरम्भ  की दो घटियाँ अभुक्त मूल हैं जिनमें उत्पन्न बालक , कन्या  , कुल के लिए अनिष्टकारी होते हैं | इनकी शान्ति अति आवश्यक है | 

जन्म कुंडली एवम व्यवसाय


जन्म कुंडली एवम व्यवसाय

व्यवसाय का प्रश्न मानव के लिए सदैव से बहुत महत्वपूर्ण रहा है |समय पर उचित मार्गदर्शन का अभाव ,अपनी रूचि व प्रकृति के अनुसार शिक्षा का न होना एवम भविष्य का अज्ञान इत्यादि अनेक कारणों से आज के युवकों को अपनी योग्यता व  पसंद का रोजगार नहीं मिलता | अनेक युवकों ने शिक्षा व विशेषज्ञता  किसी और क्षेत्र में प्राप्त की है पर व्यवसाय किसी अन्य क्षेत्र में कर रहें हैं | इस से न तो वे अपने साथ न्याय करते हैं और न ही व्यवसाय के साथ |  निश्चित जन्म कुंडली से मार्ग दर्शन ले कर यदि हम उनकी प्रकृति व संभावित व्यवसाय के अनुरूप अपने बच्चों की शिक्षा का स्वरूप निश्चित करें तो उन्हें किसी अनिश्चय का सामना नहीं करना पड़ेगा | किसी व्यक्ति की वृत्ति क्या होगी , आजीविका स्वदेश में होगी या विदेश में ,सरकारी सेवा करेगा या व्यापार ,किन पदार्थों के क्रय -विक्रय से लाभ या हानि होगी , व्यवसाय में सफलता या असफलता का संभावित समय  इत्यादि प्रश्नों के विषय में  व्यक्ति की जन्म कुंडली या प्रश्न कुंडली  उचित मार्ग दर्शन प्रदान कर सकती है |   जन्मकुंडली या प्रश्नकुंडली के दशम एवम सप्तम भाव से व्यक्ति के व्यवसाय का विचार किया जाता है | लग्न ,चन्द्र व सूर्य में जो बली हो  उस से दशम भाव में स्थित ग्रह अपने कारकत्व के अनुसार वृत्तिकारक होता है | एक से अधिक ग्रह उस स्थान पर हों तो व्यवसाय भी एक से अधिक होंगे पर मुख्य आजीविका सबसे बलवान ग्रह की होगी | यदि दशम भाव में कोई ग्रह न हो तो दशमेश के नवांशेश  के अनुसार वृत्ति होगी | , के बल के अनुसार व्यवसाय में सफलता -असफलता व लाभ -हानि का विचार करना चाहिए |

ग्रहों का कारकत्व
सूर्यादि ग्रहों का व्यवसाय एवम विभिन्न पदार्थों  से सम्बंधित कारकत्व निम्नलिखित प्रकार से है —–
सूर्य — सरकारी सेवा ,उच्च  स्तरीय प्रशासनिक सेवा ,विदेश सेवा ,उड्डयन ,ओषधि ,चिकित्सा ,सभी प्रकार के अनाज ,लाल रंग के पदार्थ , शहद ,लकड़ी व प्लाई वुड का कार्य ,सर्राफा , वानिकी ,ऊन व ऊनी वस्त्र ,पदार्थ विज्ञान ,अन्तरिक्ष विज्ञान ,फोटोग्राफी ,नाटक ,फिल्मों का निर्देशन ,राजनीति इत्यादि |
चन्द्र — श्वेत पदार्थ ,चांदी ,जल से उत्पन्न पदार्थ , डेयरी उद्योग , कोल्ड ड्रिंक्स , मिनरल वाटर ,आइस क्रीम ,आचार -चटनी -मुरब्बे , नेवी ,जल आपूर्ति विभाग ,नहरी  एवम  सिंचाई विभाग ,नमक ,चावल ,चीनी , पुष्प सज्जा ,मशरूम ,नर्सिंग , यात्राएं ,मत्स्य से सम्बंधित क्षेत्र , सब्जियां ,लांड्री ,आयात -निर्यात ,मोती , आयुर्वेदिक औषधियां ,कथा -कविता लेखन  इत्यादि

मंगल — धातुओं से सम्बंधित कार्य क्षेत्र ,सेना ,पुलिस ,चोरी ,बिजली का कार्य ,विद्युत् विभाग ,इलेक्ट्रिक एवम इलेक्ट्रोनिक इंजिनीयर ,लाल रंग के पदार्थ ,जमीन का  क्रय -विक्रय ,बेकरी ,कैटरिंग ,हलवाई,इंटों का भट्ठा, रक्षा विभाग ,खनिज पदार्थ ,बर्तनों का कार्य , वकालत , शस्त्र निर्माण , बॉडी बिल्डिंग ,साहसिक खेल ,ब्लड बैंक ,फायर ब्रिगेड ,आतिशबाजी ,रसायन शास्त्र ,होटल एवम रेस्तरां ,फास्ट -फ़ूड , जूआ ,मिटटी के बर्तन व खिलोने , शल्य चिकित्सक इत्यादि

बुध — व्यापार ,गणित ,संचार क्षेत्र ,मुनीमी ,दलाली ,आढ़त ,हरे पदार्थ ,सब्जियां ,शेयर मार्किट ,लेखा कार ,कम्प्यूटर ,फोटोस्टेट ,मुद्रण ,ज्योतिष ,लेखन ,डाक -तार ,समाचार पात्र ,दूत कर्म ,टाइपिस्ट ,कोरियर  सेवा ,बीमा ,सैल टैक्स ,आयकर विभाग , सेल्ज मैन,गणित व कोमर्स के अध्यापक ,हास्य व्यंग के चित्रकार या कलाकार इत्यादि |
गुरु —  बैंकिंग ,न्यायालय ,पीले पदार्थ ,स्वर्ण ,शिक्षक ,पुरोहित ,शिक्षण संस्थाएं ,राजनीति ,पुस्तकालय ,सभी प्रकार के फल ,मिठाइयाँ ,मोम ,घी ,प्रकाशन ,प्रबंधन ,दीवानी वकालत ,किरयाना इत्यादि |
शुक्र — चांदी के जेवर या अन्य पदार्थ ,अगरबत्ती व धूप ,श्वेत पदार्थ , कला क्षेत्र ,अभिनय , टूरिज्म , वाहन ,दूध दही ,चावल ,शराब ,श्रृंगार के साधन ,गिफ्ट हॉउस ,चाय -कोफ़ी ,गारमेंट्स ,इत्र,,ड्रेस डिजायनिंग ,मनोरंजन के साधन ,फिल्म उद्योग ,वीडियो पार्लर ,मैरिज  ब्यूरो ,इंटीरियर डेकोरेशन ,हीरे के आभूषण ,पालतू पशुओं का व्यापार या चिकित्सक , चित्रकला तथा स्त्रियों के काम में आने वाले पदार्थ , मैरिज पैलेस एवम विवाह में काम आने वाले सभी कार्य व पदार्थ  इत्यादि |
शनि — नौकरी ,मजदूरी ,ठेकेदारी ,लोहे का कार्य ,मैकेनिकल इंजिनियर ,चमड़े का काम ,कोयला ,पेट्रोल ,प्लास्टिक एवम रबर  उद्योग ,काले पदार्थ ,स्पेयर पार्ट्स ,पत्थर एवम चिप्स ,श्रम एवम समाज कल्याण विभाग ,प्रेस , टायर उद्योग ,पलम्बर , मोटा अनाज ,कुकिंग गैस ,घड़ियों का काम ,कबाड़ी का काम ,भवन निर्माण सामग्री इत्यादि |

उपरोक्त सूत्र के अतिरिक्त दशमेश की भाव स्थिति एवम दशमांश कुंडली का विश्लेष्ण भी व्यवसाय का चुनाव करने में सहायक होता है |
दशमेश की भाव स्थिति  दशमेश यदि –-
पहले भाव में हो तो  व्यक्ति सरकारी सेवा करता है या उस  का निज का स्वतंत्र व्यवसाय होता है |
दूसरे भाव में हो तो  बैंकिंग ,अध्यापन ,वकालत ,पारिवारिक काम ,होटल व रेस्तरां ,आभूषण एवम नेत्रों का चिकित्सक या ऐनकों से सम्बंधित व्यवसाय होगा |
तीसरे भाव में हो तो रेलवे ,परिवहन ,डाक एवम तार ,लेखन ,पत्रकारिता ,मुद्रण ,साहसिक कार्य , नौकरी ,गायन -वादन से सम्बंधित व्यवसाय होगा |

चौथे  भाव में हो तो खेती -बाड़ी ,नेवी ,खनन ,जमीन -जायदाद ,वाहन उद्योग ,जनसेवा ,राजनीति ,लोक निर्माण विभाग ,जल परियोजना , आवास निर्माण,आर्किटेक्ट ,सहकारी उद्यम इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |
पांचवें भाव में हो तो शिक्षण ,शेयर मार्केट , आढत -दलाली ,लाटरी ,प्रबंधन ,कला कौशल ,मंत्री पद ,लेखन,फिल्म निर्माण  इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |
छटे भाव में हो तो जन स्वास्थ्य , नर्सिंग होम ,अस्त्र -शस्त्र ,सेना ,जेल ,चिकित्सा ,चोरी ,आपराधिक कार्य ,मुकद्दमेबाजी तथा पशुओं इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |
सातवें भाव में हो तो विदेश सेवा ,आयात -निर्यात , सहकारी उद्यम , व्यापार ,यात्राएं , रिश्ते कराने का काम  इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |
आठवें भाव में हो तो बीमा ,जन्म -मृत्यु विभाग ,वसीयत , मृतक का अंतिम संस्कार कराने का काम , आपराधिक कार्य ,फाईनैंस  इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |
नवें भाव में हो तो  पुरोहिताई ,अध्यापन ,धार्मिक संस्थाएं ,न्यायालय ,धार्मिक साहित्य, प्रकाशन शोध कार्य  इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |
दसवें भाव में हो तो राजकीय एवम प्रशासकीय सेवा ,उड्डयन क्षेत्र ,राजनीति ,मौसम विभाग ,अन्तरिक्ष , पैतृक कार्य इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |
ग्यारहवें भाव में हो तो लोक या राज्य सभा पद ,आयकर ,बिक्री कर ,सभी प्रकार के राजस्व ,वाहन,बड़े उद्योग  इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |
बारहवें भाव में हो तो कारागार,विदेश प्रवास ,राजदंड इत्यादि से सम्बंधित व्यवसाय हो सकता है |

व्यवसाय प्राप्ति / पदोन्नति का समय

दशमेश ,दशम भाव स्थित ग्रह,दशम भाव तथा दशमेश को देखने वाला ग्रह  ,दशमेश से युक्त ग्रह ,दशमेश का नवांशेश ग्रह ,दशम भाव का कारक ग्रह अपनी महादशा ,अन्तर्दशा व प्रत्यंतर दशा में अपने बल एवम प्रकृति के अनुसार व्यवसाय से सम्बंधित शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं | उपरोक्त ग्रह यदि जन्म कुंडली में स्व -मित्र -उच्च  राशि नवांश में हों तो व्यवसाय सम्बन्धी  शुभ फल  अन्यथा अशुभ फल प्रदान करते हैं |गोचर में लग्नेश व दशमेश का युति या दृष्टि सम्बन्ध ,लग्नेश का दशम भाव में या दशमेश का लग्न में गोचर होने पर  भी व्यवसाय से सम्बंधित शुभ या अशुभ फल मिलता है | गोचर के समय भी उपरोक्त ग्रह स्व -मित्र -उच्च  राशि नवांश में हों तो व्यवसाय सम्बन्धी  शुभ फल  अन्यथा अशुभ फल प्रदान करते हैं | जन्मकालीन  दशम भाव ,दशमेश की राशि में या उनसे पांचवें -नवें  स्थान पर गोचर में बृहस्पति हो तो शुभ फल तथा शनि हो तो  अशुभ फल मिलता है गोचर में दशमेश शुभ युक्त ,शुभ दृष्ट , स्व -मित्र -उच्च  राशि नवांश का ,लग्न से शुभ  स्थानों पर जाएगा तो व्यक्ति को व्यवसाय प्राप्ति ,सफलता ,पदोन्नति ,यश मान में वृद्धि कराएगा तथा जब अशुभ युक्त या दृष्ट ,नीचस्थ -अस्त – शत्रु राशि नवांश में , लग्न से 6,8,12 वें भाव में जाएगा तो व्यवसाय चिंता ,हानि ,पद अवनीति तथा मान हानि कराएगा | दशा एवम गोचर ,दोनों के तालमेल से शुभाशुभ फल का निर्णय करना चाहिए | दशमेश निर्बल हो या व्यवसाय में अडचनें आ रहीं हों तो दशमेश ग्रह के रत्न को धारण करें  , उसके वार में व्रत रखें ,उस से सम्बंधित पदार्थों का उस के वार में दान करें तो अशुभ फल की निवृति होगी तथा व्यवसाय में सफलता मिलेगी |

जन्म कुंडली से मृत्यु का ज्ञान



ज्योतिष में स्वप्न विचार


ज्योतिष में स्वप्न विचार
जब हम जागते हैं ,विचारों पर हमारा नियंत्रण रहता है | पर जब हम निद्रावस्था में होते हैं तब विचारों पर हमारा नियंत्रण नहीं रह पाता| शयनावस्था में हमारा स्थूल शरीर सुप्तावस्था में रहता है पर हमारा सूक्ष्म शरीर एवम मस्तिष्क क्रियाशील रहता है और हमें स्वप्नों के माध्यम से अनेक प्रकार के पदार्थ ,दृश्य ,घटनाएं ,व्यक्ति एवम स्थान इत्यादि दिखलाता है | ये सभी दृश्य व स्थान आदि कभी कभी परिचित व अनुभव में आये हुए तथा कभी पूर्णतः नवीन तथा अपरिचित होते हैं |
| ज्योतिष शास्त्र के संहिता ग्रंथों एवम अनेक पुराणों में स्वप्नों के शुभाशुभ फल का विस्तृत वर्णन दिया गया है | कभी कभी स्वप्न के माध्यम से हमें भविष्य में होने वाली शुभ या अशुभ घटना का संकेत मिलता है | बहुत से व्यक्तियों के ऐसे अनुभव सुन ने में आते हैं कि उनको किसी शुभ या अशुभ घटना का संकेत पहले ही स्वप्न में मिल गया था | मुझे कुछ साल पहले रात्री को स्वप्न में अपने सिर के बाल झड़ते हुए दिखाई दिए | कुछ दिनों के बाद वैसा ही स्वप्न फिर दिखाई दिया जिसका अर्थ शास्त्रों में अशुभ था तथा शारीरिक अस्वस्थता का संकेत कारक था | दूसरे स्वप्न के दिखने के कुछ दिन के बाद ही मुझे लम्बी बीमारी का सामना करना पड़ा |
स्वप्नों का फल प्राप्ति काल
अनुभव में आया हुआ ,देखा हुआ ,सुना हुआ , चिंतित एवम बीमारी कि अवस्था में आया हुआ , दिन में सोने पर आया हुआ ,मल -मूत्र कि बाधा से उत्पन्न एवम बहुत लम्बा स्वप्न निरर्थक होता है | रात्रि के प्रथम प्रहर का स्वप्न एक वर्ष में , दूसरे प्रहर का आठ महीने में ,तीसरे प्रहर का तीन मॉस में ,चौथे प्रहर का एक मास में ,ब्रह्म मुहूर्त का दस दिन में तथा सूर्योदय से पूर्व देखे गये स्वप्न का फल उसी दिन ही मिल जाता है | अशुभ स्वप्न दिखने पर फिर से सो जाने पर उसका अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है | अशुभ स्वप्नों कि शान्ति के लिए देव पूजन ,ब्राह्मण भोजन ,हवन या दान करना चाहिए |

शुभ स्वप्न
विभिन्न पुराणों एवम ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार निम्नलिखित स्वप्न शुभ फल प्रदान करते हैं ——-
स्वप्न में पर्वत ,महल ,हाथी घोडा ,राजा ,गाय, किसी वाहन पर चढ़ना ,स्वेत पुष्पों का वृक्ष ,रक्त ,देवता ,ब्राह्मण ,बैल ,अग्नि ,दर्पण ,फल ,पराजित शत्रु ,अपनी मृत्यु ,शंख ,मोती ,पान ,खीर ,कलश ,चावल ,दही ,दूध ,रत्न ,अभक्ष्य भक्षण ,कच्चा मांस ,दीपक सीप ,नख -रोम  या किसी अंग की वृद्धि ,तलवार  जौ ,हरी घास ,समुद्र को पार करना ,मधु मक्खी  का काटना , बंधन मुक्त होना ,पितरों से अभिनन्दन ,रूदन ,वृक्ष या शिखर पर चढ़ना ,शरीर पर घी या मल का लगना,इंद्र धनुष ,सूर्योदय ,स्वर्ण  इत्यादि का दिखना या इनकी चर्चा होना शुभ फल दायक होता है  |
अशुभ स्वप्न
निम्नलिखित स्वप्न शुभ फल प्रदान करते हैं ——-
स्वप्न में लाल पुष्प ,ऊंचाई से गिरना ,तेल पीना ,मैले या फटे वस्त्र डालना ,सूअर -कूत्ते-गधे या ऊँट की सवारी करना ,चिता पर चढ़ना ,ध्वजा भंग होना ,नदी में डूबना ,दक्षिण दिशा की और गमन ,वमन, अंग की हानि ,नख या बालों का गिरना ,सूर्य -चन्द्र का पतन ,गृह हानि ,शत्रु से अपमान ,देव -ब्राह्मण  गुरु एवम राजा का कुपित होना  ,घर में झाड़ू देना ,मृतक के साथ मदिरा पान ,काँटा लगना ,ग्रहण ,सर मुंडवाना,शमशान ,कीचड लगना ,पितरों का कोप करना ,पका मांस ,काले रंग के पदार्थ ,गढ़हे में गिरना ,सूखे वृक्ष को देखना ,कपास ,आंधी ,भूकंप ,काक ,गिद्ध ,भैंसा ,सुखी नदी ,अपाहिज ,अपशब्द ,हड्डी ,कुषा ,घृत पान  लोहा मिलना अँधेरे में प्रवेश
इत्यादि का दिखना या इनकी चर्चा होना अशुभ  फल दायक होता है  |

टी वी चैनल पर आने वाले ज्योतिषियों से सावधान


गत कुछ वर्षों से टी वी चैनलों पर आधे -अधूरे ज्ञान से युक्त ज्योतिषियों तथा वास्तु शास्त्रियों की बाढ़ सी आ गयी है | माथे पर तिलक ,गले में अनेक मालाएं ,अँगुलियों में अंगूठियाँ ,सुंदर वस्त्र आभूषणों से सज्जित , ये तथा -कथित ज्योतिषी एवम वास्तु शास्त्री वास्तव में वैदिक ज्योतिष के मूल नियमों से भी अनभिज्ञ हैं तथा भोली -भाली जनता की आस्था से खेल कर उन्हें ठग रहें हैं | टी वी चैनल अपने आर्थिक लाभ के लिए इनको पाल पोस रहें हैं |कुछ दिन टी वी चैनलको पैसा दे कर ये ज्योतिषी का अभिनय करते हैं तथा जब इनका नाम व चेहरा कुछ महीनों में जाना -पहचाना सा हो जाता है तब उसका लाभ उठा कर अपनी दूकान चलाते हैं तथा उलटे -सीधे व मनघडंत ज्योतिष नियमों के आधार पर भविष्यवाणी करते हैं जो कभी ठीक नहीं होती | जनता को टी वी चैनल पर आने वाले ऐसे ज्योतिषियों तथा वास्तु शास्त्रियों से सावधान रहना चाहिए |

माता -पिता की सेवा पुण्यतम् कर्म


संसार में समस्त धर्मों मेंपुण्यतम् कर्म क्या है ?किस अनुष्ठान के करने से मानव अक्षय पद प्राप्त कर सकता है ?किस कर्म के करने पर मृत्यु लोक के निवासी यश एवम मोक्ष के अधिकारी हो सकते हैं ?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर पदम् पुराण के श्रृष्टि खंड में महा मुनि व्यास ने सुंदर प्रकार से दिया है |
पञ्च महायज्ञ
महा मुनि व्यास के अनुसार माता -पिता की सेवा ,सब के प्रति समता का भाव ,पतिव्रत धर्म ,भगवद भजन तथा मित्र से द्रोह न करना – ये पाँच महा यज्ञ हैं |इनमे से किसी एक का भी जो व्यक्ति अनुष्ठान करता है वह यश ,वैभव तथा मोक्ष का अधिकारी होता है |
पित्रोरचार्थ पत्युस्च साम्यं सर्व जनेषु च |
मित्रा द्रोहो विष्णु भक्ति रेते पञ्च महामखा : ||
पदम् पुराण
माता -पिता की सेवा
पाँच महायज्ञों में भी माता -पिता की सेवा को महामुनि व्यास ने सबसे अधिक महत्व प्रदान किया है |पिता धर्म है ,पिता स्वर्ग है तथा पिता ही तप है |पिता के प्रसन्न हो जाने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं |माता में सभी तीर्थ विद्यमान होते हैं |जो मानव अपनी सेवा से अपने माता -पिता को प्रसन्न एवम संतुष्ट करता है उसे गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है |जो माता -पिता की प्रदक्षिणा करता है उसके द्वारा समस्त पृथ्वी कीप्रदक्षिणा हो जाती है |जो नित्य माता -पिता को प्रणाम करता है उसे अक्षय सुख प्राप्त होता है |जब तक माता -पिता की चरण रज पुत्र के मस्तक पर लगी रहती है तब तक वह शुद्ध एवम पवित्र रहता है |
जो मनुष्य अपने माता -पिता की अवज्ञा करता है वह महा प्रलय तक नरक में निवास करता है |
रोगिणं चापि वृधंच पितरम वृत्ति कर्शितं |
विकलं नेत्र कर्णाभ्याम त्यक्त्वा ग्च्झेच्च रौरवं ||
पदम् पुराण
जो मानव रोगी , जीविकाहीन एवम अपाहिज माता पिता को त्याग देता है उसे रौरव नरक प्राप्त होता है |माता -पिता का अनादर करने पर उसके समस्त पुण्य क्षीण हो जाते हैं


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Krishan Kant Bhardwaj
Kurukshetra, Haryana, India
I`ve a long experience in the field of astrology (Specifically horoscope analysis) . I`ve written some books related to this subject;specified below. *Janam Kundali Phalit Darpan *Prashna Phal Nirnay *Brihat Jyotish Gyan -By Manoj Publication  Burari[Delhi] Along with these books my Articles have been published in many renowned magazines (Kadambini,Suman Sudha,Sarav Mangala) & newspapers(Dainik Baskar,Dainik Pratap)

My new book is ‘ VIMSHOTTARI DASHA PHAL NIRNAY ‘ on dasha system  by Manoj Publications Delhi

Readers can also contact for complete horoscope  with perdicitions ,horoscope matching, analysis and any other question related to horoscope on my email address and mobile no 9416346682

contact: email: kant.krishan@gmail.com

विवाह में अष्टकूट एवम गुण मिलान


विवाह में अष्टकूट एवम गुण मिलान
भारत वर्ष में विवाह से पूर्व वर एवम कन्या के जन्म नक्षत्रों के अनुसार अष्टकूट मिलान से गुण मिलाने की प्राचीन परम्परा है|
वर , कन्या तथा उनके परिजन एक -दूसरे की प्रकृति ,गुण -दोष आदि के बारे में प्रायःअनभिज्ञ होते हैं | विवाह से पूर्व दोनों पक्ष अपने दोषों को छिपाते हैं तथा गुणों को बढा -चढा कर दिखाते हैं जिसके कारण विवाह के कुछ समय बाद ही पति -पत्नी के संबंधों में तनाव आरम्भ हो जाता है |विवाहोपरांत वर एवम कन्या की परस्पर अनुकूलता हो ,दोनों की आयु दीर्घ हो ,धन -संपत्ति एवम संतान का सुख उत्तम हो इसी उद्देश्य से ऋषि -मुनिओं ने अपने ज्ञान एवम अनुसन्धान के आधार पर वर एवम कन्या की जन्म राशिः तथा जन्म नक्षत्रों के अनुसार विवाह से पूर्व अष्टकूट मिलान से गुण मिलाने की श्रेष्ठ पद्दति का विकास किया |प्रश्न -मार्ग ,विवाह वृन्दावन ,मुहूर्त गणपति ,मुहूर्त चिंतामणि प्रभृति ग्रंथों में अष्टकूट मिलान एवम इसकी उपयोगिता पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है |
क्या है अष्टकूट ?
वर्णों वश्यं तथा तारा योनीश्च गृह मैत्रकम |
गण मैत्रं भकूटश्च नाडी चैते गुणाधिका ||
[ मुहूर्त चिंतामणि ]
1. वर्ण 2. वश्य 3, तारा 4. योनि 5. ग्रह मैत्री 6. गण 7. भकूट 8.नाडी ये आठ अष्टकूट हैं जिनका विचार मिलान में किया जाता है | क्रम संख्या के अनुसार ही इनके गुण होते हैं |जैसे वर्ण का क्रम एक है तो गुण भी एक होगा ,योनि का क्रम चार है तो गुण भी चार ही होंगे |इस प्रकार क्रमानुसार योग करने पर अष्टकूटोँ के कुल गुण 1+2+3+4+5+6+7+8=36 गुण होते हैं |
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1. वर्ण कूट

वर्ण जन्म योनि

ब्राह्मण कर्क ,वृश्चिक ,मीन
क्षत्रिय मेष ,सिंह ,धनु
वैश्य वृष,कन्या मकर
शूद्र मिथुन ,तुला कुम्भ

वर का वर्ण कन्या से उत्तम होने पर एक गुण अन्यथा शून्य गुण मिलता है |

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2. वश्य कूट

संज्ञा राशिः
नर मिथुन ,कन्या ,तुला एवम धनु 15 अंश तक
चतुष्पद मेष ,वृष ,सिंह ,धनु के अंतिम 15 अंश ,मकर 15 अंश तक
जलचर कुम्भ ,मीन ,मकर के अंतिम 15 अंश
कीट कर्क ,वृश्चिक

सिंह राशिः को छोड़ कर सभी राशियां नर के वश में होती हैं| वृश्चिक को छोड़ कर शेष राशियां सिंह राशिः के वश में हैं |समान वश्य में 2 गुण ,एक वश्य व दूसरा शत्रु हो तो 1 गुण ,एक वश्य व दूसरा भक्ष्य हो तो 1/2 गुण प्राप्त होते हैं |
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3. तारा कूट

कन्या के जन्म नक्षत्र से वर के जन्म नक्षत्र तक तथा वर के जन्म नक्षत्र से कन्या के जन्म नक्षत्र तक गिनें |दोनों संख्याओं को अलग -अलग 9 से भाग दें |शेष 3,5,7 हो तो तारा अशुभ अन्यथा शुभ होगी |दोनों तारा अशुभ हो तो 0 गुण , दोनों शुभ हों तो 2 गुण ,एक अशुभ व दूसरी शुभ हों तो 1 गुण होता है |

4.योनि कूट

वैर
वैर
वैर
वैर
वैर
वैर
वैर
योनी

नक्षत्र
नक्षत्र

अश्व महिष सिंह हाथी मेढा वानर नेवला सर्प मृग श्वान बिल्ली मूषक व्याघ्र गौ
अश्वनी
शतभिषा
स्वाति
हस्त
धनिष्ठा
पू0भा0
भरणी
रेवती
पूष्य
कृतिका
श्रवण पू०षा उ0षा
अभिजित
मृगशिरा रोहिणी
ज्येष्ठा
अनुराधा
मूल
आर्द्रा
पुनर्वसु अश्लेशा मघा
पू०फ़ा0
विशाखा चित्रा उ०भा
उ०फ़ा0

एक ही योनि हो या अधि मित्र योनि हो तो 4 गुण , मित्र हो तो 3 गुण ,सम हो तो 2 गुण ,वैर में 1 गुण तथा महा वैर में 0 गुण मिलता है |
5. ग्रह मैत्री कूट

ग्रह—> सूर्य चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
मित्र चन्द्र मंगलगुरु सूर्य बुध चन्द्र सूर्य गुरु सूर्य शुक्र चन्द्र सूर्य मंगल बुध शनि बुध शुक्र
सम बुध मंगल गुरु शुक्र शनि शुक्र शनि मंगल गुरु शनि शनि मंगल गुरु गुरु
शत्रु शुक्र शनि बुध चन्द्र बुध शुक्र चन्द्र सूर्य चन्द्र सूर्य मंगल

वर -कन्या की एक ही राशिः हो या परस्पर मैत्री हो तो 5 गुण ,एक मित्र व एक सम हो तो 4 गुण ,दोनों सम हों तो 3 गुण ,एक मित्र व एक शत्रु हो तो 1 गुण ,एक सम व एक शत्रु हो तो 1/2 गुण ,दोनों शत्रु हों तो 0 गुण मिलता है |

6.गण

देव गण मानव गण राक्षस गण
अश्वनी भरणी कृतिका
मृगशिरा रोहिणी आश्लेषा
पुनर्वसु आर्द्रा मघा
पुष्य पूर्वा ० फा 0 चित्रा
हस्त उत्तरा ० फा 0 विशाखा
स्वाति पूर्वाषाढ़ ज्येष्ठा
अनुराधा उत्तरा षाढ़ मूल
श्रवण पूर्वा ० भा 0 धनिष्ठा
रेवती उत्तरा ० भा o शतभिषा

वर ,कन्या का गण समान हो तो 6 गुण, वर का देव तथा कन्या का मानव गण हो तो 6 गुण , कन्या का देव तथा वर का मानव गण हो तो 5 गुण ,कन्या का देव तथा वर का राक्षस गण हो तो 1 गुण ,कन्या का राक्षस तथा वर का देव गण हो या एक का मानव व दूसरे का राक्षस गण हो तो 0 गुण मिलता है |

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7 भकूट

वर एवम कन्या की जन्म राशि एक -दूसरे से 6-8, 5-9, 2-12 वें हो तो भकूट दोष होता है |
6-8 अर्थात षडाष्टक दोष से रोग ,कलह या वियोग , 5-9 अर्थात नव-पंचम से अन्पत्यता , 2-12 अर्थात द्वि -द्वादश दोष से हानि एवम दरिद्रता होती है |भकूट दोष होने पर 0 गुण अन्यथा 7 गुण मिलते हैं |

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8. नाडी कूट

आदि नाडी अश्वनी आर्द्रा पुनर्वसु उ0फा0 हस्त ज्येष्ठा मूल शतभिषा पू०भा0
मध्य नाडी भरणी मृगशिरा पुष्य पू०फ़ा0 चित्रा अनुराधा पू0षा0 धनिष्ठा उ०भा0
अन्त्य नाडी कृतिका रोहिणी आश्लेषा मघा स्वाति विशाखा उ० षा० श्रवण रेवती

वर कन्या का जन्म नक्षत्र एक ही नाडी में हो तो अत्यन्त अशुभ समझा जाता है तथा शुन्य गुण मिलता है । अन्यथा आठ गुण प्राप्त होते है ।
दोनों का जन्म नक्षत्र आदि नाडी मे हो तो वियोग , मध्य में हो तो हानि , तथा अन्त्य नाडी मे हो तो मृत्यु अथवा दारुण कष्ट सहना पड़ता है ।
अष्टकूट दोषों का परिहार
यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि वर एवम कन्या के जन्म नक्षत्र का मिलान करते हुए सभी ज्योतिषी अष्टकूट दोषों का विचार तो करते हैं पर उनके परिहारों को महत्त्व प्रदान नहीं करते |सभी मेलापक एवम मुहूर्त ग्रंथों में अष्टकूट दोषों के साथ ही उनके परिहारों का वर्णन किया गया है | परिहार उपलब्ध होने पर दोष कि निवृति मान कर उसके आधे गुण ग्रहण करने का शास्त्र उपदेश देते हैं |कुल 36 गुणों में से 18 से 21 तक गुण मिलने पर मिलान मध्यम तथा इस से अधिक होने पर उत्तरोतर शुभ मिलान होता है |18 से कम गुण मिलने पर विवाह सम्बन्ध नहीं करना चाहिए |अष्टकूट दोषों का परिहार निम्नलिखित प्रकार से वर्णित है :

अष्टकूट परिहार
वर्ण राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
वश्य राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
तारा राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
योनि राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
राशिः मैत्री 1 राशियों के नवांशेशों कि मैत्रीया एकता हो |
2 भकूट दोष न हो |
|गण 1 राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो | 2 भकूट दोष न हो |
भकूट राशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
नाडी 1. दोनों कि राशिः एक तथानक्षत्रअलग-अलग हों |a
2. दोनों के नक्षत्र एक तथा राशि अलग -अलग हो |
3. दोनों के नक्षत्रों में चरण वेध न हो अर्थात
दोनों के नक्षत्रों के चरण 1-4 या 2-3 न हो क्योंकि इनमें परस्पर वेध होता है |

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