August 20, 2011
चंद्रमा पुराणों एवम ज्योतिष शास्त्र में
विश्लेष्णात्मक अध्ययन
वेदों में चन्द्र को काल पुरुष का मन कहा गया है | वैदिक साहित्य में सोम का स्थान भी प्रमुख देवताओं में प्राप्त होता है | अग्नि ,इंद्र ,सूर्य आदि देवों के समान ही सोम की स्तुति के मन्त्रों की भी रचना ऋषियों द्वारा की गई है | पुराणों में चंद्रमा से सम्बंधित अनेक कथाओं का वर्णन प्राप्त होता है| |
पुराणों के अनुसार चन्द्र की उत्पत्ति
मत्स्य एवम अग्नि पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी न सृष्टि रचने का विचार किया तो सबसे पहले अपने मानसिक संकल्प से मानस पुत्रों की श्रृष्टि की | उनमें से एक मानस पुत्र ऋषि अत्रि का विवाह ऋषि कर्दम की कन्या अनुसुइया से हुआ जिस से दुर्वासा ,दत्तात्रेय व सोम तीन पुत्र हुए | सोम चन्द्र का ही एक नाम है |
पद्म पुराण में चन्द्र के जन्म का अन्य वृतान्त दिया गया है | ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्र अत्रि को श्रृष्टि का विस्तार करने की आज्ञा दी| महर्षि अत्रि ने अनुत्तर नाम का तप आरम्भ किया | ताप काल में एक दिन महर्षि के नेत्रों से जल की कुछ बूंदे टपक पड़ी जो बहुत प्रकाशमय थीं | दिशाओं ने स्त्री रूप में आ कर पुत्र प्राप्ति की कामना से उन बूंदों को ग्रहण कर लिया जो उनके उदर में गर्भ रूप में स्थित हो गया | परन्तु उस प्रकाशमान गर्भ को दिशाएँ धारण न रख सकीं और त्याग दिया | उस त्यागे हुए गर्भ को ब्रह्मा ने पुरुष रूप दिया जो चंद्रमा के नाम से प्रसिध्ध हुए | देवताओं ,ऋषियों व गन्धर्वों आदि ने उनकी स्तुति की | उनके ही तेज से पृथ्वी पर दिव्य औषधियां उत्पन्न हुई | ब्रह्मा जी ने चन्द्र को नक्षत्र,वनस्पतियों ,ब्राह्मण व तप का स्वामी नियुक्त किया | स्कन्द पुराण के अनुसार जब देवों तथा दैत्यों ने क्षीर सागर का मंथन किया था तो उस में से चौदह रत्न निकले थे | चंद्रमा उन्हीं चौदह रत्नों में से एक है जिसे लोक कल्याण हेतु, उसी मंथन से प्राप्त कालकूट विष को पी जाने वाले भगवान् शंकर ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया | पर ग्रह के रूप में चन्द्र की उपस्थिति मंथन से पूर्व भी सिध्ध होती है | स्कन्द पुराण के ही माहेश्वर खंड में गर्गाचार्य ने समुद्र मंथन का मुहूर्त निकालते हुए देवों को कहा कि -” इस समय सभी ग्रह अनुकूल हैं | चंद्रमा से गुरु का शुभ योग है |तुम्हारे कार्य कि सिध्धि के लिए चन्द्र बल उत्तम है |यह गोमन्त मुहूर्त तुम्हें विजय देने वाला है |” अतः यह संभव है कि चंद्रमा के विभिन्न अंशों का जन्म विभिन्न कालों में हुआ हो | चन्द्र का विवाह दक्ष प्रजापति की नक्षत्र रुपी 27 कन्यायों से हुआ जिनसे अनेक प्रतिभाशाली पुत्र हुए | इन्हीं 27 नक्षत्रों के भोग से एक चन्द्र मास पूर्ण होता है |
चन्द्र का स्वरूप
मत्स्य पुराण के अनुसार चन्द्र गौर वर्ण का ,श्वेत वस्त्र धारी तथा श्वेत अश्वों से युक्त रथ में विराजमान हैं | नारद पुराण में चन्द्र को सुन्दर नेत्रों वाला ,मृदुभाषी ,एवम वात -पित्त प्रकृति का कहा गया है |
ज्योतिष के प्रसिध्ध फलित ग्रंथों के अनुसार चन्द्र वृताकार ,वात -कफ प्रकृति का ,सुन्दर ,मृदु वचन बोलने वाला ,सुन्दर नेत्रों वाला ,गौर वर्ण ,श्वेत वस्त्र धारण करने वाला , विचार शील ,तथा बुध्धि मान है |
चन्द्र की गति
विष्णु पुराण ,गरुड़ पुराण व मत्स्य आदि पुराणों के अनुसार चन्द्र का रथ तीन पहियों वाला है जिसके वाम व दक्षिण भाग में दस अश्व जुते रहते हैं | ध्रुव के आधार पर स्थित उस रथ पर चंद्रमा नागवीथी पर स्थित 27 नक्षत्रों का भोग करते हुए भ्रमण शील रहते हैं |शुक्ल पक्ष के आरम्भ में सूर्य के पर भाग में स्थित चन्द्र का पर भाग दिन के क्रम से पूर्ण होता है | देवताओं द्वारा किये गये अमृत पान से क्षीण चन्द्र को उस समय सूर्य अपनी सुषुम्ना किरणों से परिपूर्ण करते रहते हैं |चन्द्र की कलाएं कृष्ण पक्ष में क्षीण तथा शुक्ल पक्ष में वृद्धि को प्राप्त होती हैं |पूर्णिमा तिथि को पूर्ण चन्द्र के दर्शन होते हैं | कृष्ण पक्ष की द्वितीया से चतुर्दशी तक देवता चन्द्र की अमृतमयी किरणों का पान करते हैं |15 दिन तक देवता , ऋषि व पितर अमृत पान के लिए चन्द्र के निकट रहते हैं |जब दो कला मात्र शेष रहा चन्द्र, सूर्य मंडल में प्रवेश करके उसकी अमा नामक किरण में रहता है तो वह अमावस्या तिथि कहलाती है | उस तिथि में पितृ गण अमृतपान करके एक मास तक संतुष्ट रहते हैं |
चंद्रमा का कारकत्व
पुराणों में ——– मत्स्य पुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने भृगु नंदन और्व को अपनी पूजा अर्चना से प्रसन्न किया तथा युध्ध में सहायता की मांग की | और्व ने उसे एक अग्निमयी माया प्रदान की जिसने देवताओं को संतप्त करना आरम्भ कर दिया | देवेन्द्र के आग्रह पर वरुण ने इस माया को नष्ट करने का संकल्प किया पर चन्द्र को जल का उत्पत्ति स्थान कहते हुए इंद्र को उसकी सहायता लेने के लिए भी कहा |
यद्येशा प्रतितन्त्व्या कर्तव्यों भगवान् सुखी |
दीयतां में सखा शक्र तोय योनिर्निशाकर : ||
इंद्र ने चन्द्र की स्तुति करते हुए उसके कारकत्व का विस्तृत वर्णन किया है जिसका उपयोग ज्योतिशास्त्र में किया जाता है |
त्वमप्रतिमवीर्यश्च ज्योतिषां चेश्वेरश्वर: |
त्वन्म्यं सर्वलोकानां ,रसं,रसविदो विदु : ||
हे चन्द्र ! आप पराक्रमी हैं ,नक्षत्रों के स्वामी हैं तथा रस के रूप में सभी प्राणियों में स्थित हैं |
श्वेतभानुर्हिम तनुर्ज्योतिशाम अधिप : शशि |
अब्द्कृत काल योगात्मा ईज्यो यत्तरसो अव्यय : ||
आपकी किरणें श्वेत वर्ण की है ,देह हिम मयि है ,आप नक्षत्रों के स्वामी है | शश के चिन्ह से युक्त ,संवत्सर के रचयिता ,काल योग स्वरूप तथा रस रूप हैं |
औषधीश: क्रिया योनिरम्भो योनिरनुष्णभाक |
शीतान्शुर मृताधारस्चपल: श्वेत वाहन
|
आप औषधियों के स्वामी ,क्रिया व जल के उत्पत्ति स्थान ,शीतल ,अमृत के आधार हैं ,आपका वाहन श्वेत रंग का है |
त्वं कान्ति : कान्त वपुषाम ,त्वं सोम : सोम वृत्तिनाम |
सौम्यस्त्वं ,सर्व भूतानां ,तिमिर घंस्वगृक्षराट ||
आप ही सब में कान्ति हैं ,सौम्य हैं ,तिमिर नाशक हैं व नक्षत्रों के राजा हैं |
देवराज इंद्र की स्तुति से प्रसन्न हो कर चंद्रमा ने हिम वर्षा की जिस से अग्नि माया नष्ट हो गयी तथा देवताओं की विजय हुई |
ज्योतिष शास्त्र में भी चन्द्र को नक्षत्रों का स्वामी ,हिम के समान श्वेत वर्ण का ,नर -नारियों में मृदुता व कान्ति के रूप में , औषधियों का स्वामी ,शीतल , संवेदनशील ,रसीले पदार्थों का स्वामी ,सौम्य ,एवम जल का स्वामी कहा गया है | जन्म लग्न में शुक्ल पक्ष का चन्द्र हो तो जातक सौम्य व शीतल स्वभाव का होता है यह प्रत्यक्ष देखने में आता है | चन्द्र कल्पना , कृषि ,श्वेत पदार्थ ,स्त्री एवम मन का स्वामी भी है |
चन्द्र की कलाओं में वृद्धि व ह्रास क्यों ? चन्द्र की कलाओं में वृद्धि व ह्रास क्यों होता है ,इसका कारण पुराणों में उपलब्ध है| अत्रिनंदन चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की सताईस नक्षत्र रुपी कन्याओं से हुआ | चन्द्र एक महीने में इन्हीं नक्षत्र रुपी पत्नियों का भोग करते हैं| चन्द्र का रोहिणी पर अधिक प्रेम रहता था | ध्यान देने योग्य है कि ज्योतिष शास्त्र में भी चन्द्र वृष राशि में उच्च का कहा गया है जिसमें रोहिणी नक्षत्र के चारों चरण आते हैं| रोहिणी पर चन्द्र का विशेष प्रेम उसकी बहनों को अच्छा नहीं लगा और उन्हों ने पिता दक्ष से हस्तक्षेप करने कि प्रार्थना की |
दक्ष ने चन्द्र को समझाने की चेष्टा की पर चन्द्र पर इसका तनिक भी असर नहीं हुआ | क्रोधित हो कर दक्ष ने अपने दामाद सोम को क्षय रोग से ग्रस्त होने का शाप दे दिया | चन्द्र के पश्चाताप करने पर तथा अपने अपराध को स्वीकार करने पर उसकी पत्नियों ने उसको क्षमा कर दिया तथा अपने पिता दक्ष से भी क्षमा करने की विनती की| शाप को पूरी तरह से वापिस लेने में असमर्थता जता करदक्षने चंद्रमा की कलाओं को पंद्रह दिन क्षय तथा पंद्रह दिन वृद्धि होने का वर दे दिया | तभी से कृष्ण पक्ष में पंद्रह दिन चन्द्र की कलाओं में ह्रास तथा शुक्ल पक्ष में पंद्रह दिन वृद्धि होती है |शुभ कार्यों के आरम्भ में शुक्ल पक्ष का चन्द्र प्रशस्त माना जाता है |
ज्योतिष शास्त्र में चन्द्र
चन्द्र की गति सभी ग्रहों से अधिक है इस लिए इसे मनुष्य का मन कहा गया है | चन्द्र एक राशि में 2-1/4 दिन संचार करता है | इस की पृथ्वी से दूरी 384000 कि० मी ० तथा व्यास 3480 कि ० मी ० है |यह 29-1/2 दिन में पृथ्वी कि परिक्रमा कर लेता है जिसे चन्द्र मास कहते हैं तथा जिसके 15-15 दिन के दो पक्ष शुक्ल एवम कृष्ण होते हैं | चन्द्र कि राशि कर्क है | यह वृष में उच्च व मूल त्रिकोण तथा वृश्चिक में नीच का होता है |चन्द्र कर्क तथा वृष राशि में ,शुक्ल पक्ष में ,सोमवार में ,अपने द्रेष्काण होरा तथा नवांश में ,रात्रिकाल में ,चतुर्थ भाव में ,दक्षिणायन में ओर वायव्य दिशा में बलवान होता है |
चन्द्र के रोग
चंद्रमा जन्मकुंडली में नीच या शत्रु राधि का ,छटे -आठवें -बारहवें भाव में स्थित हो ,पाप ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो मनोविकार ,चिंता ,नेत्र दोष ,जलोदर ,नजला जुकाम व खांसी ,कामला ,क्षय रोग, अरुचि व मूत्रकृच्छ आदि रोग उत्पन्न करता है |
फल देने का समय
चन्द्र अपना शुभाशुभ फल 24-26 वर्ष कि आयु में एवम अपनी दशाओं व गोचर में प्रदान करता है |शिशु अवस्था पर भी इस का अधिकार कहा गया है|
चन्द्र का राशि फल
जन्म कुंडली में चन्द्र का मेषादि राशियों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :-
मेष में चन्द्र हो तो जातक लाल नेत्रों वाला ,गर्म तथा अल्प भोजन करने वाला ,जल्दी प्रसन्न होने वाला ,भ्रमणशील ,कामी ,अस्थिर धन वाला ,शूर ,स्त्रियों को प्रिय ,खराब नख वाला ,अभिमानी ,व्रण युक्त मस्तक वाला ,चंचल प्रकृति का ,जल से भय करने वाला ,कमजोर घुटने वाला तथा क्रोध करने वाला होता है |
वृष में चन्द्र हो तो जातक अभिमानी ,अल्पभाषी ,भाग्यवान ,तेजस्वी ,बहुभोजी ,विशाल छाती वाला ,दानी ,सुन्दर ,कन्या सन्तिति वाला ,क्षमा शील ,मध्य व अंतिम समय में सुखी ,मोटी जांघ व मोटे मुख वाला ,भारी गर्दन वाला ,दुःख व क्लेश सहन क्र लेने वाला ,सब को प्रिय ,स्थिर मित्रों वाला होता है |
मिथुन में चन्द्र हो तो जातक ऊँची नाक तथा काले नेत्रों वाला ,कला का ज्ञाता ,काव्य कर्ता,विषय सुख में लीन,तीव्र बुध्धि का नसों से युक्त ,सुंदर ,सौभाग्यवान ,हास्य प्रिय , दूत कर्म करने वाला ,चतुर ,मीठी वाणी से युक्त ,स्त्री के वश में ,लंबी देह वाला होता है |
कर्क में चन्द्र हो तो जातक शीघ्र चारी ,प्रेम वश स्त्रियों के अधीन ,अच्छे मित्रों से युक्त ,छोटा शरीर ,मोटे गले वाला ,बगीचे तथा जलाशय से प्रेम करने वाला ,ज्योतिष ज्ञान का ज्ञाता ,नम्र ,सत्यवक्ता ,प्रवासी ,अधिक बालों वाला , कभी वृद्धि व कभी हानि से युक्त होता है |
सिंह में चन्द्र हो तो जातक पुष्ट हड्डी वाला ,अल्प रोम वाला ,छोटी पीली आँखों वाला ,भूख प्यास उदर व दांत के रोग से पीड़ित ,मांस भोजी ,उग्र ,दानी ,पुत्रहीन या अल्प पुत्र वाला ,वन व पर्वत का प्रेमी ,माता का भक्त ,वीर ,गंभीर दृष्टि वाला ,स्त्री से द्वेष करने वाला ,क्रोधी ,स्थिर मति वाला होता है
कन्या में चन्द्र हो तो जातक लज्जाशील ,मनोहर दृष्टि वाला ,सुखी ,कलाओं में निपुण ,धर्मात्मा ,बुध्धिमान ,सुरतप्रिय,परगृह व वित्त से युक्त ,कोमल वचन बोलने वाला ,अधिक कन्या से युक्त होगा |
तुला मे चन्द्र हो तो जातक देव ब्राह्मण साधु कि पूजा करने वाला ,स्त्रीजित ,ऊँची नाक वाला, पतले व चंचल शरीर वाला ,क्रय विक्रय में चतुर ,बधुओं का उपकार करने वाला पर उनसे फिर भी तिरस्कार पाने वाला होगा|
वृश्चिक में चन्द्र हो तो जातक बड़े नेत्र व छाती वाला ,बाल्यावस्था में व्याधि से युक्त ,लोभी ,नास्तिक ,रजा के द्वारा नष्ट धन वाला कठोर स्वभाव वाला तथा छिप कर पाप करने वाला होगा |
धनु में चन्द्र हो तो जातक वह लंबे मुख तथा ग्रीवा से युक्त ,पिता के धन से युक्त ,दानी , कवि, वक्ता ,मोटे दांत ओर बड़े कान वाला ,छोटे कन्धों वाला ,प्यार से वश में आने वाला होगा |
मकर में चन्द्र हो तो जातक अपनी स्त्री व पुत्रों को बहुत प्यार करने वाला , कमर से नीचे दुर्बल ,सुंदर नेत्र ,पतली कमर वाला ,बड़ों का उपदेश मानने वाला ,सौभाग्यशाली , अल्प उत्साही ,धार्मिक ,सत्य वादी ,आलसी ,सर्दी को सहन न करने वाला ,भ्रमणशील व लोभी होगा |
कुम्भ में चन्द्र हो तो जातक लंबी गर्दन ,रुखा व अधिक रोम युक्त शरीरवाला ,नस प्रधान ,लंबा कद ,पाप कर्म व पराये धन में आसक्त ,धर्म रहित ,दुष्ट स्वभाव का ,दुखी व जीवन में उतार -चढ़ाव से युक्त होता है |
मीन में चन्द्र हो तो जातक दूसरों के धन का भोगी ,सम व सुन्दर शरीर वाला ,उठी हुई नाक वाला ,स्त्री के वश में ,पंडित , उत्तम स्वभाव का ,गान विद्या का प्रेमी ,रजा का नौकर ,कान्ति युक्त तथा जल या जलोत्पन्न पदार्थों से आजीविका चलने वाला होता है |
चन्द्र का सामान्य दशा फल
जन्म कुंडली में चन्द्र स्व ,मित्र ,उच्च राशि -नवांश का ,शुभ भावाधिपति ,षड्बली ,शुभ युक्त -दृष्ट हो तो चन्द्र की शुभ दशा में समस्त कार्यों की सिध्धि ,मन में खुशी ,घर में सुख ,स्त्री व संतान सुख ,कृषि से लाभ ,घर में मंगल कार्य ,राज सहयोग ,भाग्योथान , विद्या लाभ ,व्यवसाय में सफलता ,पद प्राप्ति व पदोन्नति ,विदेश यात्रा ,गीत -संगीत -अभिनय आदि कलात्मक कार्यों में रूचि ,कल्पनाशीलता ,जलोत्पन्न, तरल व श्वेत पदार्थों के कारोबार से व खेल कूद से धन लाभ,पर्यटन तथा स्वभाव में नम्रता होती है |जिस भाव का स्वामी चन्द्र होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में सफलता व लाभ होता है |
यदि चन्द्र कृष्ण पक्षीय ,नीच शत्रु राशि नवांश का ,षड्बल विहीन ,अशुभभावाधिपति पाप युक्त दृष्ट हो तो चन्द्र दशा में निद्रा व आलस्य का अधिक प्रभाव ,स्व जनों से वैर ,मानसिक विकलता ,जल से भय ,अरुचि ,नजला जुकाम खांसी का रोग ,परिवार में कलह , कन्या का जन्म ,चित्त में चंचलता ,अस्थिरता ,मित्रों से अनबन होती है | जिस भाव का स्वामी चन्द्र होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में असफलता व हानि होती है |
गोचर में चन्द्र
जन्मकालीन चन्द्र से 1,3,6,7,10,11 वें स्थान पर गोचर वश भ्रमण करने पर चंद्रमा शुभ फल प्रदान करता है |
जन्मकालीन चन्द्र से प्रथम स्थान पर चन्द्र का गोचर सुख आनंद ,उत्तम भोजन ,वस्त्र , अच्छा स्वास्थ्य व उपहार प्राप्ति करता है |
दूसरे स्थान पर चन्द्र का गोचर नेत्र दोष ,विद्या हानि ,परिवार में मतभेद ,कुभोजन व असफलता दिलाता है |
तीसरे स्थान पर चन्द्र का गोचर धन लाभ, शुभ समाचार प्राप्ति कराता है मन प्रसन्न रहता है भाग्य अनुकूल रहता है|
चौथे स्थान पर चन्द्र का गोचर स्वजनों से विवाद ,सुख हीनता ,छाती में कफ विकार ,जल से भय करता है |
पांचवें स्थान पर चन्द्र का गोचर मन में अशांति ,उदर विकार,संतान कष्ट ,विद्या में असफलता करता है |
छ्टे स्थान पर चन्द्र का गोचर धन लाभ ,उत्तम स्वास्थ्य ,शत्रु पराजय ,मातुल पक्ष से लाभ करता है
सातवें स्थान पर चन्द्र के गोचर से काम सुख ,यात्रा ,व्यापार में लाभ ,शीतल पेय ,आर्थिक लाभ होता है |
आठवें स्थान पर चन्द्र के गोचर से कफ रोग ,विवाद ,मानसिक कष्ट ,पाचन हीनता व् जल से भय होता है |
नवें स्थान पर चन्द्र के गोचर से संतान कष्ट ,भाग्य की विपरीतता ,सरकार की और से परेशानी होती है |
दसवें स्थान पर चन्द्र के गोचर से अभीष्ट सिध्धि ,सरकार से लाभ और सहयोग ,सम्मान ,पद लाभ होता है |
ग्यारहवें स्थान पर चन्द्र के गोचर से आय वृध्धि ,व्यापार में लाभ ,मित्र सुख ,श्वेत एवम तरल पदार्थों से लाभ होता है |
बारहवें स्थान पर चन्द्र के गोचर से अपव्यय ,शारीरिक कष्ट ,मानसिक चिंता होती है तथा किसी गलत कार्य में रूचि होती है |
चन्द्र शान्ति के उपाय
जन्मकालीन चन्द्र निर्बल होने के कारण अशुभ फल देने वाला हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है |
रत्न धारण – श्वेत तथा गोल मोती चांदी की अंगूठी में रोहिणी ,हस्त ,श्रवण नक्षत्रों में जड़वा कर सोमवार या पूर्णिमा तिथि में पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की अनामिका या कनिष्टिका अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप ,पुष्प ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |
दान व्रत ,जाप - सोमवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः मन्त्र का ११००० संख्या में जाप करें |सोमवार को चावल ,चीनी ,आटा, श्वेत वस्त्र ,दूध दही ,नमक ,चांदी इत्यादि का दान करें |
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