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ज्योतिष शास्त्र से सम्बंधित विभिन्न शोध पूर्ण लेख में प्रकाशित किया गया | टिप्पणी करे

“The Essence of Vedic Astrology”


 

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भारतीय प्राचीन हस्तरेखा ज्ञान


 

 भारतीय प्राचीन हस्तरेखा  ज्ञान  

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हिन्दू सामुद्रिक ग्रंथों तथा पुराणों में व्यक्ति के हाथ से उस की प्रकृति,आयु,स्वास्थ्य ,संतान तथा अन्य शुभाशुभ फलों के ज्ञान  का विस्तार से वर्णन किया गया है | हिंदु मतानुसार पुरुषों के दायें  तथा स्त्रियों के  बाएं हाथ से शुभ अथवा अशुभ द्योतक लक्षणों का विचार करना चाहिए | जो पुरुष बाएं हाथ से ही सभी कार्य करते हैं उनके बाएं हाथ से ही विचार करना चाहिए | कुछ ग्रंथों के मत से पुरुषों का बायाँ तथा स्त्रियों का दायाँ हाथ जन्मजात गुण-अवगुणों  को अभिव्यक्त करता है | अतः दोनों हाथों का तुलनात्मक परीक्षण करना चाहिए | हाथ के चित्र से रेखाओं तथा चिन्हों का विचार करना अधिक  उपयुक्त रहता है यद्यपि रंग,कोमलता,मांसलता आदि का विचार उसके स्पर्श द्वारा ही संभव हो सकता है | प्रस्तुत लेख में हिन्दू सामुद्रिक ग्रंथों तथा पुराणों में वर्णित हस्त परीक्षा से सम्बंधित  मुख्य सूत्रों का वर्णन किया जाएगा |

मणिबंध

हाथ तथा बाजु के जोड़ के स्थान अर्थात पाणिमूल को ही मणिबंध कहा जाता है | मणिबंध का पुष्ट, दृढ तथा मांसल होना व्यक्ति को भाग्यशाली तथा ढीला- ढाला,चटकने की आवाज करने वाला तथा कमजोर होना व्यक्ति को भाग्यहीन बनाता है |

मणिबंध पर कलाई के चारों ओर तीन पूर्ण अखंडित रेखाएं हों तो व्यक्ति दीर्घायु से युक्त तथा महाधनी होता है | ये रेखाएं यवमाला के रूप में हों तो व्यक्ति किसी राज्य का अधिपति होता है |  मणिबंध पर ऐसी दो रेखाएं व्यक्ति को राज्य का मंत्री तथा एक रेखा धन-धान्य से परिपूर्ण करती है | अखंडित तथा स्पष्ट रेखाएं पूर्ण शुभ फल प्रदान करती हैं तथा अस्पष्ट तथा खंडित रेखाएं अल्प मात्रा में ही शुभफलदायक होती हैं |

मणिबंधोऽव्यवच्छिन्नो रेखात्रय विभूषितः |

ददाति न चिरादेव मणिकांचन मण्डनम् ||

भविष्य पुराण के अनुसार जिस स्त्री के मणिबंध पर चारों ओर तीन अखंडित रेखाएं हों वह रत्न आभूषण पहनने वाली सौभाग्यशालिनी होती है |

हाथ की ओर से पहली रेखा पर मध्य में तारे का चिन्ह हो तो विरासत में धन मिलने की संभावना होती है | मणिबंध की पहली रेखा पर गुणा का चिन्ह हो तो जीवन के प्रथम भाग में ,दूसरी रेखा पर हो तो मध्य भाग में तथा तीसरी रेखा पर हो तो बुढापे में संघर्ष तथा कष्टों का सामना करना पड़ेगा |

कर पृष्ठ

कर पृष्ठ अर्थात हाथ का उपरी भाग मणिबंध से उंचा हो ,नसें उभरी हुई न दिखाई देती हों,बालों से रहित हो तो व्यक्ति भाग्यवान तथा धनवान होता है | सूखा,उभरी हुई नसों वाला ,खुरदरा तथा बालों से युक्त कर पृष्ठ भाग्यहीन व्यक्ति का होता है | काले तथा मोटे बाल जिस व्यक्ति के करपृष्ठ पर होते हैं वह प्रायः उग्र, क्रोधी तथा क्रूर प्रकृति का होता है |

 

हथेली

बहुरेखापरिकलितं पाणितलं भवति यस्य मनुजस्य |

यदि  वा   रेखाहीनं    सोल्पायुर्दुखिःतो निःस्वः  ||

अर्थ- जिस मनुष्य की हथेली बहुत सी  रेखाओं से भरी हुई हो या रेखाहीन हो वह अल्पायु ,दुःखी,चिंताग्रस्त तथा धनहीन होता है |

अरुणेनाढयः पीतेनागम्य स्त्रीरतिः करतलेन |

सितासितेन दरिद्रो  नीलेनापेयपायी स्यातः ||

अर्थ- लाल हथेली वाला व्यक्ति धनवान,पीली हथेली वाला अधिक भोग करने वाला , श्वेत अथवा काली हथेली वाला धनहीन तथा नीलापन युक्त हथेली वाला अधिक मदिरा का सेवन करने वाला होता है |

संवृत्त निम्नेन धनी पाणितलेनोन्नतेन दानरुचिः |

निम्नेन जनक वित्तत्यक्तोः विषमेण धनहीनाः ||

अर्थ-  जिस व्यक्ति की हथेली गोलाकार निचाई लिए हो वह धनवान ,ऊँची हथेली( हथेली का मध्य भाग नीचा न हो कर किनारों के समान ही हो ) वाला दानी ,नीची हथेली वाला पिता के धन का त्याग करने वाला तथा ऊँची नीची विषम हथेली वाला धन से हीन होता है |

स्पर्श करने पर हथेली नरम तथा मांसल प्रतीत हो तो व्यक्ति विलासिता प्रिय ,कलाप्रेमी,आराम प्रिय  तथा संवेदनशील प्रकृति का होता है | कम नरम तथा मांसल हथेली वाला व्यक्ति परिश्रमी होता है तथा सख्त ,खुरदरी तथा मांस रहित हथेली वाला व्यक्ति मेहनती,स्वार्थी तथा निम्न प्रकृति का होता है |

गरुड़ पुराण के अनुसार पीत वर्ण के करतल वाला व्यक्ति परस्त्री से रमण करने वाला होता है |

भविष्य पुराण के अनुसार रूखे करतल वाला व्यक्ति निर्धन,रक्तवर्ण वाला राजा तथा काले या नीले करतल वाला व्यक्ति नशे का आदी होता है |

हथेली में चिन्हों का फल

किसी किसी व्यक्ति की हथेली में विभिन्न प्रकार के एक या अधिक  चिन्ह दिखाई देते हैं जिनका आकार किसी विशेष आकृति से मिलता जुलता होता है| ऐसे चिन्हों का हथेली में किसी भी स्थान पर होने से मिलने वाला विशेष शुभाशुभ फल सामुद्रिक ग्रंथों तथा पुराणों में इस प्रकार कहा गया है ——–

चिन्ह शुभाशुभ फल
मत्स्य भाग्यवान,धार्मिक,पुत्रसुख, धनी तथा समुद्र की यात्रा
शंख,चक्र, कमल शास्त्रों का ज्ञाता,धनवान  तथा  प्रतिष्ठित
अष्टकोण भूमि का स्वामी
पर्वत कलश राज मंत्री
अंकुश कुंडल छत्र राजा,मंत्री,उच्चपदाधिकारी
मछली की पूंछ विद्वान,धनवान तथा पैतृक संपत्ति पाने वाला
यव विद्यावान,वक्ता,विख्यात
नाव समुद्र के मार्ग से व्यापार करने वाला ,धनवान
तलवार , तीर,धनुष साहसी,बलशाली,युद्ध तथा विवाद में विजयी
स्वास्तिक ऐश्वर्यशाली, बुद्धिमान,विद्यावान
त्रिशूल धर्म में रूचि
हल भूमि तथा कृषि क्षेत्र में लाभ
ध्वजा प्रतापी,धार्मिक ,यशस्वी,वृद्धावस्था में बहुत सुख
चन्द्र सुंदर,भोगी,प्रेमी,कलात्मक रुचियों वाला
त्रिकोण भूमि तथा पालतू पशुओं का सुख ,धनवान,
तिल पुत्रवान
वृत्त क्षमाशील
सर्प क्रोधी तथा महाधनी
चतुष्कोण विपत्ति से रक्षा
तुला ,वेदी व्यापार में लाभ
वृक्ष स्थिर लक्ष्मी, अनेक सेवकों का सुख

 

चिन्हों का मुख हथेली के अन्दर की ओर हो तो उनका फल जीवन में सदा ही मिलता है तथा बाहर की ओर हो तो आयु की पिछली अवस्था में ही मिलता है | भग्न तथा अस्पष्ट चिन्हों का फल बहुत ही अल्प मात्रा में मिलता है |

हाथ के नखों का विचार

नखों के अध्ययन से व्यक्ति के स्वभाव,स्वास्थ्य तथा अन्य शुभाशुभ का ज्ञान होता है | पुराणों तथा हिन्दू सामुद्रिक ग्रंथों में वर्णित हाथ के नाखूनों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है :-

टेढ़े मेढ़े तथा रेखाओं से युक्त नख दरिद्रता के परिचायक हैं |

निर्मल, चिकने, उन्नत  तथा लालिमा से युक्त नख भाग्यवानों के होते हैं |

पीले नख किसी रोग के लक्षण हैं तथा ऐसा व्यक्ति धोखा देने वाला भी  हो सकता है  |

नखों में सफेदी हो तो व्यक्ति योगी होता है तथा उसका  वैराग्य की तरफ झुकाव होता है |

नख कठोर हों तथा उन पर खड़ी धारियां हों या श्वेत बिंदु हों  तो स्नायविक दुर्बलता समझनी चाहिए |

नख संकरे अर्थात कम चौड़ाई वाले हों तो व्यक्ति रीढ़ की हड्डी में दोष से युक्त तथा  कम शारीरिक क्षमता वाला होता है |

नख चौड़े अधिक तथा लम्बाई में बहुत कम हों तो व्यक्ति आलोचक तथा  बहस करने वाला होता है |

नख छोटे हों तथा उनकी जड़ में अर्ध चन्द्र न हों या बहुत ही छोटे हों तो व्यक्ति को दिल का रोग हो सकता है |

नाखून गोलाकार हों तो व्यक्ति ऐश्वर्यशाली होता है |

अंगूठे का नाखून कछुए की पीठ के समान उठा हुआ हो तो व्यक्ति भाग्यहीन होता है |

नाखूनों की जड़ में स्थित अर्ध चन्द्र अधिक बड़े हों तो सामान्य से अधिक तेज हृदय गति का संकेत करते हैं |

तुष अर्थात भूसी के समान नख हों तो व्यक्ति नपुंसक होता है |

चपटे तथा टूटे-फूटे नाखूनों वाला व्यक्ति निर्धन होता है |

भोजराज के मत से नाखूनों पर श्वेत बिंदु हों तो व्यक्ति धनवान होता है |

तर्जनी अंगुली के नाखून पर श्वेत रंग का बिंदु या चिन्ह हो तो यश प्राप्ति तथा काला बिंदु या चिन्ह हो तो  अपयश का, मध्यमा अंगुली के नाखून पर श्वेत रंग का बिंदु या चिन्ह हो भ्रमण का  तथा काला बिंदु या चिन्ह हो तो दुर्घटना का  ,अनामिका अंगुली के नाखून पर श्वेत रंग का बिंदु या चिन्ह हो  लाभ तथा कीर्ति का तथा काला बिंदु या चिन्ह हो तो पराजय का , कनिष्ठा अंगुली के नाखून  पर श्वेत रंग का बिंदु या चिन्ह हो आर्थिक लाभ का  तथा काला बिंदु या चिन्ह हो तो हानि का तथा अंगूठे के नाखून  पर श्वेत रंग का बिंदु या चिन्ह हो प्रेम में सफलता का  तथा काला बिंदु या चिन्ह हो तो अपराध या हानि का परिचायक हैं |

नाखून की जड़ में स्थित बिंदु या चिन्ह भविष्य का , मध्य में वर्तमान का तथा अग्र भाग में भूतकाल की शुभाशुभ  घटना का संकेत करते हैं |

हाथ की अंगुलियाँ

बृहत्संहिता के पुरुष लक्षणाध्याय में हाथ की अँगुलियों का वर्णन करते हुए कहा गया है की —-

हस्तान्गुल्यो दीर्घाश्र्चिरायुषामवलिताश्र्च सुभगानाम्  |

मेधाविनां च सूक्ष्माश्र्चिपिटाः परकर्मनिरतानाम्  ||

स्थूलाभिर्धनरहिता बहिर्नताभिश्र्च शस्त्रनिर्याणाः |

कपिसदृशकरा धनिनो व्याघ्रोपमपाणयः पापाः ||

अर्थ – दीर्घ आयु  वाले पुरुष की अंगुलियाँ लम्बी,सुभग पुरुषों की सीधी ,बुद्धिमानों की पतली तथा सेवकों की अंगुलियाँ चपटी होती हैं | मोटी अंगुली वाले पुरुष  निर्धन,बाहर को झुकी अँगुलियों वाले शस्त्र से मृत्यु प्राप्त करने वाले,वानर के हाथ जैसे पुरुष धनी तथा बाघ के हाथ जैसे हाथ वाले पुरुष पापी होते हैं |

जिस स्त्री अथवा पुरुष  की अंगुलियां दीर्घ, सुकोमल, सीधी, आपस में सटी हुई तथा गोल होंगी वह धनवान तथा सुखी होगा |

सूखी, टेढ़ी, अधिक मोटी तथा परस्पर न सटी हुई अंगुलियाँ निर्धन व्यक्तियों की होती हैं |

जिस व्यक्ति की अंगुलियाँ आपस में सटी हुई होती हैं अर्थात मिलाने पर जिनमें छिद्र दिखाई नहीं देता .वह जीवन में धन संचित करने में सफल रहता है  तथा जिस की अँगुलियों को मिलाने पर मध्य में रिक्त स्थान दिखाई देता है, वह खर्चीला,धनहीन तथा त्यागी होता है |

तर्जनी तथा मध्यमा के बीच छिद्र दिखाई दे तो जीवन के प्रथम भाग में , मध्यमा तथा अनामिका के बीच में हो तो जीवन के मध्य भाग में तथा अनामिका तथा कनिष्ठिका के बीच में हो तो बुढापे में अधिक व्यय तथा धनहीनता होती है | हाथ की सभी अँगुलियों के बीच  में रिक्त स्थान दिखाई दे तो व्यक्ति पर यह प्रभाव जीवन भर रहता है |

जिस व्यक्ति की कनिष्ठिका लम्बी तथा उर्ध्व रेखाओं से युक्त होती है उसे व्यापार में लाभ होता है |

गरुड़ पुराण के अनुसार छोटी अँगुलियों वाले व्यक्ति मेधावी, कृश अँगुलियों वाले विनयी ,स्थूल अँगुलियों वाले निर्धन तथा चपटी अँगुलियों वाले व्यक्ति नौकर होते हैं |

नारद संहिता के अनुसार कनिष्ठिका अंगुली अनामिका के तीसरे पर्व से आगे गयी हो तो ऐसे व्यक्ति के  धन की वृद्धि, मातृ पक्ष की सबलता तथा दीर्घायु होती है |

अँगुलियों के पर्व लम्बे हों तथा अंगूठे की जड़ में शुक्र स्थान पर रेखाएं हों तो व्यक्ति  भाग्यवान , धनी, दीर्घायु तथा पुत्रवान होता है |

बाएं हाथ की अँगुलियों के बीच वाले पर्व में स्थित खड़ी सीधी रेखाएं शत्रुओं की तथा दायें हाथ के बीच वाले पर्व पर स्थित खड़ी सीधी रेखाएं मित्रों की संख्या बताती हैं |

हाथ का अंगूठा

हाथ के अंगूठे से व्यक्ति के साहस तथा आत्मविश्वास का पता चलता है | जितना अंगूठा लंबा तथा पुष्ट होगा व्यक्ति उतना ही साहस ,आत्मविश्वास तथा बौद्धिक शक्ति से युक्त होगा | अंगूठा छोटा तथा आगे से मोटा हो तो व्यक्ति जिद्दी तथा असभ्य होता है| ऐसे व्यक्ति की हथेली भी यदि सख्त तथा खुरदरी है तो झगड़ा भी कर सकता है अतः ऐसे व्यक्ति के साथ बहस करने से बचना चाहिए  |

अंगूठा पीछे की ओर झुका हुआ लचकदार लगे तो ऐसा व्यक्ति बहुत उदार, शीघ्र मित्र बनाने वाला,खर्चीला ,मिलनसार  तथा अपने को प्रत्येक परिस्थिति के अनुसार ढालने वाला होगा |

अंगूठा पीछे की ओर झुका हुआ तथा लचकदार न हो कर सीधा तथा सख्त हो तो ऐसे व्यक्ति व्यवहारिक,परिश्रमी मितव्ययी होते हैं तथा अधिक मिलना जुलना पसंद नहीं करते |

अंगूठे का नाखून वाला पर्व सामान्य से बड़ा हो तो व्यक्ति दृढ आत्मिक  बल,  तथा इच्छा शक्ति के कारण स्वयं के निर्णयों पर ही विश्वास करता है तथा बहुत छोटा होने पर इच्छा शक्ति निर्बल होने से किसी भी विषय में निर्णय लेने में अक्षम होता है |

अंगूठे का दूसरा पर्व अधिक दीर्घ हो तो ऐसे व्यक्ति की तर्क शक्ति तथा विश्लेषन  करने की क्षमता अच्छी होती है |

जिस व्यक्ति के अंगूठे के दोनों पर्व स्वभाविक रूप से लम्बे  तथा पुष्ट हों वह जीवन में सफलता प्राप्त करता है | अंगूठे की कुल लम्बाई को पांच भागों में विभक्त करने पर  नख वाला पर्व दो भाग तथा नीचे वाला पर्व तीन भाग हो तो यह पर्वों की  स्वभाविक लम्बाई होगी |

अंगूठे के मध्य में यव ( जौ) का चिन्ह हो तो व्यक्ति अनेक विद्याओं का ज्ञाता , यशस्वी,सुखी तथा भोगवान होता है | ऐसा यव बीच में से कटा हो तो लगभग 50 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति को यश तथा समृद्धि मिलती है |

अंगूठे की जड़ में जितने यव के चिन्ह होंगे उतने पुत्र होने की संभावना होगी | अंगूठे के मूल में  चारों और वृत्त बनाने वाली यवों की तीन मालाएं हों तो व्यक्ति शासक ,दो मालाएं हों तो उच्च पदाधिकारी तथा एक माला हो तो धनवान होता है |

हथेली में प्रमुख  रेखाएं

सामुद्रिक शास्त्र में हाथ की रेखाओं के गुण-अवगुणों का वर्णन इस प्रकार किया गया है —-

अच्छिन्ना गंभीरा पूर्णा रक्ताब्जदलनिभा मृदुला |

अंतर्वृत्ता स्निग्धा कर रेखा शस्यते पुंसाम् ||

व्यक्ति की हथेली में छिन्नता से रहित,गंभीर,सम्पूर्ण ,मृदुल ,स्निग्ध,लाल कमल जैसे वर्ण वाली रेखाएं शुभ फल देने वाली होती हैं |

पल्लविता विच्छिन्ना विषमाः परुषाःसमास्फुटितरूक्षाः |

विक्षिप्ताश्र्च  विवर्णाः  हरिताः  कृष्णाः पुनर्शुभाः    ||

शाखाओं से युक्त,टूटी हुई, टेढ़ी मेढ़ी, खुरदरी, रूक्ष ,फटी या बिखरी हुई ,विवर्ण, हरे या काले रंग की रेखाएं अशुभ फल देने वाली होती हैं |

पितृ रेखा

मणिबंध से तर्जनी अंगुली के मूल भाग तक शुक्र क्षेत्र को घेरती गोलाई युक्त रेखा को पितृ रेखा अथवा गोत्र रेखा कहा जाता है |

पितृ रेखा मणिबंध से निकली हुई , दोष रहित हो तथा अंगूठे तथा तर्जनी के मध्य स्थान तक जाए तो व्यक्ति  का कुल बड़ा होता है , वह अपने कुल में प्रमुखता प्राप्त करता है तथा सबकी सहायता करने वाला होता है | छिन्न रेखा से कुल में बिखराव होता है तथा व्यक्ति को जीवन में जीवन में असफलता तथा अपमान का सामना करना पड़ता है | रेखा अपूर्ण तथा छोटी  हो तो व्यक्ति का कुल भी छोटा होता है तथा  वह सदा कष्ट में रहता है |

पितृ रेखा  में से जितनी शाखाएं अंगूठे की दिशा में जा रही हों उतने मित्र जीवन  में  सच्चे सहायक होते हैं  |  पितृ रेखा  में से जितनी स्पष्ट शाखाएं अँगुलियों की दिशा में ऊपर की ओर जा रही हों उतनी बार व्यक्ति को जीवन में उन्नति तथा विशेष पद की प्राप्ति होती है |

पितृ रेखा पर तिल का चिन्ह भव्य वाहन के सुख का संकेत है |

अंगूठे तथा तर्जनी के बीच का क्षेत्र पितृ तीर्थ होता है जहां तर्जनी के नीचे दो पड़ी रेखाएं पिता तथा माता की मृत्यु से सम्बंधित होती हैं | ऊपर वाली रेखा बड़ी हो तो पहले पिता की तथा नीचे वाली रेखा बड़ी हो तो पहले माता की मृत्यु होती है | यदि ये दोनों रेखाएं पितृ तीर्थ पर किसी स्थान पर मिली हुई हों तो व्यक्ति परिवार को जोड़ कर रखे वाला होता है | बाएं हाथ में इन रेखाओं का ऐसा सम्बन्ध हो तो व्यक्ति के स्त्री पक्ष के सम्बन्धियों से विशेष स्नेह सम्बन्ध होते हैं |

पितृ तीर्थ पर एक रेखा ऊपर की ओर जाती हो तो व्यक्ति अकेला ही मृत्यु को प्राप्त होता है | ऐसी  एक से अधिक रेखाएं हों तो व्यक्ति  की मृत्यु अकेले नहीं होती है |

पितृ रेखा तथा धन रेखा तर्जनी के नीचे मिली हुई हों तो व्यक्ति पर घर की जिम्मेदारियां अधिक होती हैं | यदि नहीं मिली हों तो घर के टूटने का भय होता है |

दो पितृ रेखा हों तो व्यक्ति दीर्घायु,सुखी तथा उत्तराधिकार में धन प्राप्त करने वाला होता है |

धन अथवा मातृ रेखा

स्कन्द पुराण के अनुसार आयु रेखा के नीचे से  हाथ के करभ से निकल कर जो रेखा अंगूठे तथा तर्जनी के मध्य किसी स्थान तक जाती है उसे धन अथवा मातृ रेखा कहते हैं | पाश्चात्य  मत में इसे मस्तिष्क रेखा कहा जाता है | यह रेखा  सुंदर,गहरी तथा दीर्घ हो तो व्यक्ति धनवान तथा वैभव संपन्न होता है |

धन रेखा पर काकपद का चिन्ह हो तो व्यक्ति बहुत धन कमाता है पर उतना ही व्यय कर देता है |

मातृ रेखा तथा आयु रेखा में बहुत कम अंतर हो तो व्यक्ति को श्वास रोग होता है |

आयु रेखा

कनिष्ठिका अंगुली की जड़ में स्थित बुध क्षेत्र से निकल कर तर्जनी अंगुली की ओर जाने वाली रेखा को आयु रेखा कहा गया है | पाश्चात्य  मत में इसे हृदय रेखा कहा जाता है |

गरुड़ पुराण के अनुसार यदि कनिष्ठिका के नीचे से आरम्भ हो कर सुंदर,गहरी तथा अविछिन्न रेखा तर्जनी तक जाए तो व्यक्ति की आयु पूर्ण होती है | आजकल  के विचार से पूर्ण आयु  से तात्पर्य लगभग 100 वर्ष की आयु को  समझना चाहिए  |  आयु रेखा मध्यमा के मूल में स्थित शनि स्थान  तक जाए तो 75 वर्ष, अनामिका के मूल  में स्थित सूर्य स्थान तक जाए तो 50 वर्ष तथा कनिष्ठिका के बुध क्षेत्र तक ही सीमित रहे तो 25 वर्ष के लगभग व्यक्ति की आयु को जानना चाहिए |

आयु रेखा जिस किसी स्थान पर छिन्न हो उस स्थान की अवधि में जीवन को भय, द्वीप हो तो कलह क्लेश, विषमता हो तो धन का नाश तथा खुरदरापन  हो तो शरीर को कष्ट होता है |

आयु रेखा जिस किसी स्थान पर लाल रंग का तिल या दाग हो तो उस अवधि में व्यक्ति को रक्त विकार ,श्वेत चिन्ह या धब्बा हो तो ज्वर तथा नीले रंग का चिन्ह या धब्बा हो तो विष से हानि  होने की संभावना होती है |

जिस व्यक्ति की आयु रेखा अँगुलियों की जड़ तक जाती हो वह धर्मकर्म तथा परोपकार के कार्यों में लगा रहता है |

आयु रेखा पर तर्जनी के नीचे  बृहस्पति स्थान पर नक्षत्र का चिन्ह  धन तथा मान की हानि,मध्यमा के नीचे शनि स्थान पर सुख तथा स्वास्थ्य  की हानि, अनामिका के नीचे सूर्य स्थान पर विद्या तथा यश की हानि तथा कनिष्ठिका के नीचे बुध स्थान पर व्यापार तथा बुद्धि की हानि सम्बंधित ग्रह के समय में होने  का संकेत करते हैं |

आयु रेखा से एक शाखा रेखा बृहस्पति स्थान पर तथा दूसरी शाखा शनि स्थान पर गयी हो तो व्यक्ति अपने पुरुषार्थ के बल पर भाग्यशाली होता है |

आयु रेखा श्रृन्खलाकार हो तो व्यक्ति उत्साह हीन होता है |

ऊर्ध्व रेखा या भाग्य रेखा

मणिबंध स्थान से निकल कर जो रेखा अँगुलियों के मूल की ओर जाती है उसे  ऊर्ध्व रेखा या भाग्य रेखा  कहा जाता है | समुद्र ऋषि के अनुसार —

त्यक्त्वाऽघो मणिबंधं या रेखा स्यात्करगामिनी |

सुवर्ण रत्नराज्यश्री दायिका सा  न संशयः  ||

अर्थ :- यह रेखा स्वर्ण,रत्न तथा राज्यश्री देने वाली है इसमें संशय नहीं है |

यह रेखा आरम्भ में पितृ रेखा से मिली हो तथा उस स्थान पर शंख या मत्स्य का चिन्ह हो तो ऐसा व्यक्ति आर्थिक रूप से बहुत समृद्धशाली होता है |

समुद्र ऋषि के मतानुसार यह रेखा बलवान तथा अखंडित हो तथा  मध्यमा के मूल तक पहुँचती हो तो व्यक्ति को  सुखी व सौभाग्यशाली  बनाती है | ब्राह्मण के हाथ में ऐसी रेखा विद्वत्ता  ,क्षत्रिय के हाथ में राज्य,वैश्य के हाथ में धन तथा शूद्र  के हाथ में सुख देने वाली होती है |

ऊर्ध्व रेखा मणिबंध से निकल कर अनामिका की ओर जाए तो व्यक्ति को राजपूज्य,धनी तथा साहूकार बनाती है |

ऊर्ध्व रेखा मणिबंध से निकल कर कनिष्ठिका की ओर जाती हो तो व्यक्ति व्यापारी, यशस्वी तथा महाधनवान् होता है |

विवाह रेखा

पुरुष की दायें तथा स्त्री के बाएं हाथ की  कनिष्ठिका अंगुली के मूल तथा आयु रेखा के मध्य स्थित पड़ी रेखाएं विवाह अथवा प्रणय संबंधों की सूचक हैं | जो रेखा कटी हुई,सूक्ष्म तथा विषम होगी वह विवाहित या प्रणय सम्बन्ध सफल नहीं होगा |

संतान रेखा

मूलेंगुष्ठ्स्य  नृणां स्थूला रेखा भवन्ति यावंत्यः |

तावन्तः पुत्राः स्युः  सूक्ष्माभिः   पुत्रिकास्ताभिः ||

अंगूठे की जड़ में स्थित मोटी रेखाएं पुत्र सूचक तथा पतली रेखाएं पुत्रियों की सूचक होती हैं |

छिन्न संतान  रेखा  संतान सम्बन्धी कष्ट की परिचायक है |

भाई बहिन की रेखा

आयु रेखा के नीचे करभ से निकलती  जितनी मोटी रेखाएं हों उतने भाई तथा जितनी पतली  रेखाएं हों उतनी बहिन व्यक्ति की होती हैं |

छिन्न तथा कटी फटी  रेखा  भाई या बहिन से सम्बंधित कष्ट की सूचक होती है |

मित्र शत्रु रेखा

बाएं हाथ की अँगुलियों के बीच वाले पर्व में स्थित खड़ी सीधी रेखाएं शत्रुओं की तथा दायें हाथ के बीच वाले पर्व पर स्थित खड़ी सीधी रेखाएं मित्रों की संख्या बताती हैं |

यात्रा रेखा

अंगूठे की जड़ से निकल कर जो रेखाएं पितृ रेखा की ओर जाती है यात्रा रेखाएं होती हैं  | यात्रा रेखा पर द्वीप या वेध हो तो  उस यात्रा में कष्ट उठाना पड़ता है |

सूर्य अथवा धर्म रेखा

अनामिका के नीचे सूर्य स्थान पर स्थित उर्ध्व रेखा को धर्म रेखा तथा पाश्चात्य मत से सूर्य रेखा कहा जाता है | यह रेखा व्यक्ति को विद्वान,यशस्वी तथा पुण्यशील बनाती है 

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Krishna Kant Bharadwaj
Writer and astrologer

Born 10-12-1954 in Ladwa district Kurukshetra (Haryana). Attitude to Swadhyaya from early childhood. Bachelor of Political Science from Kurukshetra University.
Areas of Interest: Driving, oil painting, badminton, playing on flute, photography, sightseeing of natural, religious and historical sites.
Region of special interest: Reading,contemplating and writing literature of Vedic astrology and to help the public in finding the solutuions of their personal problems through horoscope analysis.
About 30 years of practical experience in the field of astrology . Many analytical and important articles on various topics of astrology literature have been published
in special edition of astrology of reputed Kadambini and Kalyan and many other magazines. free consultation service is available on my Blog ‘ Vedic Astrology’
astropoint.wordpress.com.
My six books published on Astrology literature are as under:-
List  and a short description of published texts: –

1 Janam Kundli Falit Darpan (Manoj Prakashan Buradi Delhi)

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The first published text, in simple language, having a detailed method of making a horoscope. Apart from this, basic principles have been described in detail to determine the auspicious or inauspicious results of the combinations in the horoscopes. Available on Manoj Prakashan Buradi Delhi and all online shopping channels.2 Brihat Jyotish Gyaan (Manoj Prakashan Burari Delhi)

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In this book,horoscope making and analysis, the classical principles of Vaastu Shastra, match making, Muhurta, and the remedies to remove the suffering caused by malefic planets have been described. This book can be a guide for the students who have started to learn astrology.Available on Manoj Prakashan Buradi Delhi and all online shopping channels.
3 Prashn Phal Nirnay (Manoj Prakashan Burari Delhi)

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For those persons who have not remembered their exact time of birth,this is a unique book giving the knowledge of the present, the past and the future through the Prashan kalik Kundli. In addition to question, there is also a detailed description of many other methods to decide the auspicious or inauspicious results.Available on Manoj Prakashan Buradi Delhi and all online shopping channels.
4 Vimshottri Dasha Phal Nirnay (Manoj Prakashan Burari Delhi)

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Based on the detailed study and contemplation of the ancient Vedic astrology texts,this book has detailed description of how to analize the Vimshottri Dasha and determine the timing of the coming good or evil events on the basis of the horoscope. Available on Manoj Prakashan Buradi Delhi and all online shopping channels.
5 Jyotish Nibandhmala ( Educreation Publishing Bilaspur Chhattisgarh)

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This is a collectable book for your library which consists of 32 important and useful topics like progeny,marriage,profession,business and gemstones etc. on diffrent fields of astrology.Detailed and analytical explanation in each essay is made in simple and understandable language. Available on all online shopping channels and at link https://www.educreation.in/store/jyotish-nibandhmala-krishan-kant-bhardwaj.html.          6 The Essence of Vedic Astrology (Educreation Publishing Bilaspur Chhattisgarh)

 

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Based on the Vedic astrology written in the English language, this book has been Released on 15/5/2017 at the residence of the Honorable Mr. Subhash Sudha, MLA of Thanesar (Kurukshetra). The essence of the Puranas, Codes and ancient astrological texts has been contained in this text. Of course this book will be helpful to enhance the knowledge of all the readers. Available on all online shopping channels and at link https://www.educreation.in/store/the-essence-of-vedic-astrology-krishan-kant-bhardwaj.html.

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जन्मकुंडली श्री अरविन्द केजरीवाल


Vedic Astrology - By Krishan Kant Bhardwaj

जन्मकुंडली श्री अरविन्द केजरीवाल

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श्री अरविन्द केजरीवाल जी की उपलब्ध जन्मकुंडली के अनुसार वर्तमान गुरु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा 17-4-17 से 24-3-18 तक रहेगी | मंगल वृष लग्न के लिए अशुभ तथा नीच राशि में तृतीय भाव में है जो चतुर्थ भाव( जनता,लोकप्रियता,जनसमर्थन तथा मित्र वर्ग ) का 12 वां अर्थात हानि का स्थान है अतः इस अवधि में बहुत से मित्र साथ छोड़ देंगे, लोकप्रियता तथा जनसमर्थन में भारी गिरावट आएगी | भाग्य की प्रतिकूलता रहेगी | तृतीय स्थान से श्रवण तथा कंठ  का विचार होता है अतः नीचस्थ मंगल से गले में पीड़ा तथा खांसी का कुप्रभाव अधिक रहेगा तथा कुछ  अशुभ समाचार सुनने पड़ेंगे |मंगल की दशम पर दृष्टि से  सत्ता तथा प्रभाव इस अवधि में क्षीण होते जायेंगे | कुंडली में भाग्येश तथा दशमेश शनि नीच राशि में हानि के स्थान पर स्थित है जिस से यह स्पष्ट है की वे राजसत्ता का उचित…

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जन्मकुंडली श्री अरविन्द केजरीवाल


जन्मकुंडली श्री अरविन्द केजरीवाल

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श्री अरविन्द केजरीवाल जी की उपलब्ध जन्मकुंडली के अनुसार वर्तमान गुरु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा 17-4-17 से 24-3-18 तक रहेगी | मंगल वृष लग्न के लिए अशुभ तथा नीच राशि में तृतीय भाव में है जो चतुर्थ भाव( जनता,लोकप्रियता,जनसमर्थन तथा मित्र वर्ग ) का 12 वां अर्थात हानि का स्थान है अतः इस अवधि में बहुत से मित्र साथ छोड़ देंगे, लोकप्रियता तथा जनसमर्थन में भारी गिरावट आएगी | भाग्य की प्रतिकूलता रहेगी | तृतीय स्थान से श्रवण तथा कंठ  का विचार होता है अतः नीचस्थ मंगल से गले में पीड़ा तथा खांसी का कुप्रभाव अधिक रहेगा तथा कुछ  अशुभ समाचार सुनने पड़ेंगे |मंगल की दशम पर दृष्टि से  सत्ता तथा प्रभाव इस अवधि में क्षीण होते जायेंगे | कुंडली में भाग्येश तथा दशमेश शनि नीच राशि में हानि के स्थान पर स्थित है जिस से यह स्पष्ट है की वे राजसत्ता का उचित उपयोग करने तथा यश प्राप्त करने में असमर्थ रहेंगे | 12-8-17 से 5-10-17 तक मंगल में शनि का प्रत्यंतर केजरीवाल जी के लिए अधिक अशुभ हो सकता है |

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अपने को भीड की आँखों से मत देखो


हम अपना जीवन प्रायः दूसरों के दृष्टिकोण के अनुसार ही जीते हैं |हमारा रहन सहन,खान पान तथा व्यवहार सभी कुछ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बाहर से ही प्रभावित रहता है अर्थात हम अपने आप को अपने नेत्रों से नहीं भीड़ के नेत्रों से देखते हैं |अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र ने एक बार मिर्जा ग़ालिब को भोजन का निमंत्रण दिया | ग़ालिब के वस्त्रों पर पैबंद लगे हुए थे और नये वस्त्रों के लिए धन नहीं था |उसके मित्रों ने परामर्श दिया की बादशाह की दावत में ऐसे  फटे हुए वस्त्र डाल कर जाना उचित नहीं होगा अतः कहीं से अच्छे वस्त्र उधार या किराये पर ले लेना ठीक रहेगा |ग़ालिब  अपने मन के अनुसार ही चलते थे अतः अपने मित्रों की इस  सलाह पर ध्यान नहीं  दिया |  उन्हीं वस्त्रों को अच्छी  तरह धुलवा कर पहन लिया और बादशाह से मिलने चल दिए |पहरेदार  ने मिर्जा साहिब को उनके वस्त्रों के कारण भीतर जाने से रोक  दिया |मिर्जा ने  बहुत कहा की आज बादशाह सलामत ने ही  उन्हें  दावत पर निमंत्रित किया है | पर पहरेदार नहीं माने | मिर्जा वापिस गये और अपने किसी मित्र से अच्छे कीमती वस्त्र उधार ले कर पहन लिए | अब पहरेदार  उनको सम्मान पूर्वक बादशाह के पास ले गया |दस्तरखान बिछ गया और बादशाह तथा मिर्जा ग़ालिब को स्वादिष्ट शाही व्यंजन परोसे गये | बादशाह के सामने बैठे ग़ालिब भोजन को अपने  वस्त्रों को खिलाने लगे |बादशाह अचंभित ! हैरान  होते  हुए बादशाह ने पूछा ,” मियाँ ! ये क्या कर रहे हो ?” मिर्जा ग़ालिब ने बड़ी सादगी से उत्तर दिया ,” बादशाह सलामत , ग़ालिब को तो आपके पहरेदारों ने भीतर ही आने नहीं दिया था | अब ये उधार के कीमती  वस्त्र मेहमान बन कर आये हैं अतः शाही दावत खाने के असली  हकदार भी यही  हैं |” बादशाह ने स्वीकार किया कि वस्त्रों के आधार पर  किसी के वास्तविक व्यक्तित्व तथा चरित्र का अनुमान  नहीं लगाना चाहिए तथा प्रत्येक व्यक्ति को   अपना जीवन अपने दृष्टिकोण के अनुसार  ही जीना चाहिए  दूसरों के दृष्टिकोण के अनुसार नहीं |

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