astropoint.wordpress.com के समस्त  प्रबुद्ध पाठकों को दीपावली के शुभ पर्व पर हार्दिक शुभ कामनाएं |27_10_2016-diwalidiya

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श्राद्ध का महत्व एवम् शास्त्रीय विधि


   श्राद्ध का महत्व एवम् शास्त्रीय  विधि

शास्त्रों में मनुष्यों पर तीन प्रकार के ऋण कहे गये हैं – देव ऋण ,ऋषि ऋण  तथा पितृ ऋण | आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितरों की तृप्ति के लिए उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करके पितृ ऋण को उतारा जाता है |श्राद्ध में  तर्पण ,ब्राहमण भोजन तथा दान का विधान है | इस लोक में मनुष्यों द्वारा दिए गये हव्य -कव्य पदार्थ पितरों को कैसे मिलते हैं यह विचारणीय प्रश्न है |जो लोग यहाँ मृत्यु  को  प्राप्त होते हैं वायु शरीर प्राप्त करके कुछ जो पुण्यात्मा होते हैं स्वर्ग में जाते हैं ,कुछ जो पापी होते हैं अपने पापों का दंड भोगने नरक में जाते हैं तथा कुछ जीव अपने कर्मानुसार स्वर्ग तथा नर्क में सुखों या दुखों के भोगकी अवधि पूर्ण करके नया शरीर पा कर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं |

श्राद्ध शब्द श्रद्धा का ही द्योतक है अर्थात हम अपने मृत पितरों के निमित्त जो भी दान-पुण्य आदि सत्कर्म श्रद्धापूर्वक  करते हैं वही श्राद्ध है | अपने पूर्वजों को स्मरण करने की परम्परा तो प्रत्येक धर्म में है यद्यपि उसका रूप अलग हो सकता है |

जब तक पितर श्राद्धकर्ता पुरुष की तीन पीढ़ियों तक रहते हैं तब तक उन्हें स्वर्ग और नर्क में भी भूख प्यास,सर्दी गर्मी  का अनुभव होता है पर कर्म न कर सकने के कारण वे अपनी भूख -प्यास आदि स्वयम मिटा सकने में असमर्थ रहते हैं | इसी लिए श्रृष्टि के आदि काल से ही पितरों के निमित्त श्राद्ध का विधान हुआ | देव लोक व पितृ लोक में स्थित पितर श्राद्ध काल में अपने सूक्ष्म शरीर से श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में स्थित हो कर श्राद्ध का सूक्ष्म भाग ग्रहण करते हैं तथा अपने लोक में वापिस चले जाते हैं | श्राद्ध काल में पितृ लोक के स्वामी यम, प्रेत तथा पितरों को श्राद्ध भाग ग्रहण करने के लिए वायु रूप में पृथ्वी लोक में जाने की अनुमति देते हैं | पर जो पितर किसी योनी में जन्म ले चुके हैं उनका भाग सार रूप से  अग्निष्वात, सोमप,आज्यप,बहिर्पद ,रश्मिप,उपहूत, आयन्तुन ,श्राद्धभुक्,नान्दीमुख नौ दिव्य पितर जो नित्य एवम सर्वज्ञ हैं, ग्रहण करते हैं तथा जीव जिस शरीर में होता है वहाँ उसी के अनुकूल भोग प्राप्ति करा कर उन्हें तृप्त करते हैं | इसी लिए पहले दिव्य पितरों का तर्पण किया जाता है बाद में अपने पितरों का |

यदाहारा  भवन्त्येते  पितरो  यत्र योनिषु  |

तासु  तासु  तदाहारः  श्राद्धन्नेनोपतिष्ठति ||

यथा गोषु प्रनष्टासु वत्सो विदन्ति मातरम् |

तथान्नं  नेते  विप्रो  जन्तुर्यत्रावतिष्ठते   ||

(गरुड़ पुराण )

मनुष्य मृत्यु के बाद अपने कर्म से जिस भी योनि में जाता है उसे श्राद्ध अन्न उसी योनि के आहार के रूप में प्राप्त होता है | पितरों के निमित्त ब्राह्मण को कराया गया भोजन श्राद्धान्न के रूप में स्वयं उनके पास पहुँच जाता है

श्राद्ध में पितरों के नाम ,गोत्र व मन्त्र व स्वधा शब्द का उच्चारण ही प्रापक हैं जो उन तक सूक्ष्म रूप से हव्य कव्य  पहुंचाते हैं |

श्राद्ध में जो अन्न पृथ्वी पर गिरता है उस से पिशाच योनि में स्थित पितर , स्नान से भीगे वस्त्रों से गिरने वाले जल से वृक्ष योनि में स्थित पितर, पृथ्वी पर गिरने वाले जल व गंध से देव  योनि में स्थित पितर,  ब्राह्मण के आचमन के जल से पशु , कृमि व कीट योनि में स्थित पितर, अन्न व पिंड से मनुष्य योनि में स्थित पितर तृप्त होते हैं |

श्राद्ध के प्रकार

मूलतः तीन प्रकार के श्राद्ध होते हैं –

1 नित्यश्राद्ध – जिसे किसी निश्चित तिथि पर किया जाए वह नित्य श्राद्ध होता है जैसे माता -पिता आदि की मृत्यु तिथि पर प्रति वर्ष किये जाने वाला एकोद्दिष्ट श्राद्ध या महालय पक्ष में किये जाने वाला पार्वण श्राद्ध आदि |

  1. नैमित्तिक श्राद्ध – जो श्राद्ध किसी विशेष निमित्तार्थ किये जाएँ उसे नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं |जैसे घर में किसी मांगलिक उत्सव पर अथवा ग्रहण,संक्रांति आदि पर्वों पर किया जाने वाला श्राद्ध |
  2. काम्य श्राद्ध – जो श्राद्ध किसी विशेष कामना के लिए किया जाए उसे काम्य श्राद्ध कहते हैं |

अमावस्या का महत्व

पितरों के निमित्त अमावस्या तिथि में श्राद्ध व दान का विशेष महत्व है | सूर्य की सहस्र किरणों में से अमा नामक किरण प्रमुख है जिस के तेज से सूर्य समस्त लोकों को प्रकाशित करते हैं | उसी अमा में तिथि विशेष को चंद्र निवास करते हैं |इसी कारण से धर्म कार्यों में अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है |पितृगण अमावस्या के दिन वायु रूप में  सूर्यास्त तक घर के द्वार पर उपस्थित रहते हैं तथा अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं | पितृ पूजा करने से मनुष्य आयु ,पुत्र ,यश कीर्ति ,पुष्टि ,बल, सुख व धन धान्य प्राप्त करते हैं  |

श्राद्ध का समय                                         

सूर्य व चन्द्र ग्रहण , विषुव योग,सूर्य सक्रांति ,व्यतिपात ,वैधृति योग ,भद्रा ,गजच्छायायोग ,प्रत्येक मास की अमावस्या तथा महालया में श्राद्ध करना चाहिए | श्राद्ध में कुतुप काल का विशेष महत्त्व है | सूर्योदय से आठवाँ मुहूर्त कुतुप काल कहलाता है इसी में पितृ तर्पण व श्राद्ध करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और वे संतुष्ट हो कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं | महालय में पितर  की मृत्यु तिथि पर पितृ तर्पण व श्राद्ध करना चाहिए | यदि मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो या किसी कारण से उस तिथि पर तर्पण व श्राद्ध न किया जा सका हो तो अमावस्या पर अवश्य तर्पण व श्राद्ध कार्य कर देना चाहिए |                       

श्राद्ध में ब्राह्मणों का चयन                                 

श्राद्ध के लिए ब्राह्मणों का चयन सावधानी से करना चाहिए अन्यथा श्राद्ध विफल होगा | निर्णयसिंधु ,गरुड़ पुराण ,पृथ्वी चंद्रोदय के अनुसार रोगी ,ज्योतिष का कार्य करने वाले ,राज सेवक ,गायन –वादन करने वाले ,ब्याज से वृत्ति करने वाले ,खल्वाट ,पशु बेचने वाले ,अधर्मी ,मद्य विक्रेता ,जटाधारी ,कुबड़े ,कुत्ते के काटे हुए ,गर्भ की हत्या कराने वाले ,नास्तिक ,हिंसक , अंगहीन ,स्व गोत्री ,गर्भवती या रजस्वला स्त्री का पति तथा व्यापारी ब्राह्मण को श्राद्ध के लिए निमंत्रण नहीं देना चाहिए | पिता –पुत्र या दो भाई भी एक साथ श्राद्ध कर्म में वर्जित हैं |

विद्यार्थी ,वेदार्थ ज्ञाता ,ब्रह्मचारी ,जीविका से हीन ,योगी ,पुत्रवान, सत्यवादी ,ज्ञाननिष्ठ,माता –पिता का भक्त ब्राह्मण तथा अपना भांजा,दामाद व दोहित्र श्राद्ध कर्म में निमंत्रण योग्य हैं | परन्तु तीर्थ में श्राद्ध करते हुए ब्राह्मणों की परीक्षा नहीं करनी चाहिए |

श्राद्ध में प्रयोग होने वाले तथा नहीं होने वाले पदार्थ

श्राद्ध में गेहूं ,तिल ,मूंग ,यव ,काले उडद ,साठी के चावल ,केला ,ईख ,चना ,अखरोट विदारी कंद,सिंघाड़ा ,लोंग,इलायची ,अदरख ,आमला ,मुनक्का ,अनार ,खांड ,गुड ,हींग ,दूध व दही के पदार्थ ,मधु, ,माल पुआ ,गौ या भैंस का घृत, खीर, शाक, का प्रयोग पितरों को तृप्त करता है |  अशुभ  कार्यों से कमाया धन,पालक ,पेठा,बैंगन ,शलगम ,गाजर ,लहसुन ,राजमा ,मसूर ,बासी व पैर से स्पर्श किया गया पदार्थ ,काला नमक इत्यादि श्राद्ध में निषिद्ध कहे गए हैं |

पितृ तर्पण तथा श्राद्ध की संक्षिप्त विधि

श्राद्ध कर्ता श्राद्ध तिथि पर स्नान आदि से निवृत्त हो कर अपने दायें हाथ की अनामिका में  कुश निर्मित पवित्री या सोने / चांदी की अंगूठी धारण कर ले तथा मस्तक पर तिलक लगाए | |ॐ केशवाय नमः ॐ माधवाय नमः ॐ गोविन्दाय नमः मन्त्र से आचमन करे तथा सभी सामग्री व स्वयं पर गंगा जल से छींटे दे कर शुद्धि करे | कुश के आसन पर बैठ कर पूर्व दिशा की ओर मुख कर के तथा दायें हाथ में जल,चावल तथा पुष्प ले कर श्राद्ध का संकल्प करे |

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु अद्य ब्रह्मणोंऽन्हि द्वितीय परार्द्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे  वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरण जम्बू द्वीपे भरतखंडे भारत वर्षे ……स्थाने (स्थान का नाम ) ……..संवत्सरे ( संवत्सर का नाम ) ……….मासे ( मास का नाम )……..पक्षे ( पक्ष का नाम ) ………तिथौ ( तिथि का नाम ) ………दिने ( दिन का नाम )………. गोत्रे ( अपने गोत्र का नाम ) …….नामऽहं .( अपना नाम) श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं पितृतर्पणं ब्राह्मणभोजनं दक्षिणा दानं सहितं च करिष्ये |

दक्षिण दिशा की और मुख करें तथा हाथ जोड़ कर पितरों का आवाहन करें –

आ यन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः  |

अस्मिन्   यज्ञे   स्वधया   मदन्तोऽधि  तेऽवन्त्वस्मान्  ||

(यजुर्वेद )

जनेऊ को दायें कंधे  पर रख कर बाएं हाथ के नीचे ले जाएँ | जनेऊ नहीं है तो दायें कंधे पर परना या गमछा रखें | ताम्बे के अर्घ्य पात्र में तिल छोड़ दें तथा बायाँ घुटना पृथ्वी पर लगा कर दायें हाथ के पितृ तीर्थ( अंगूठे और तर्जनी के मध्य  ) से गंगा जल व काले तिलों से तीन तीन जलान्जलियाँ दें –

अमुक गोत्रः अस्मत्पिता अमुक ( पिता का नाम ) वसुरुपस्तृप्यतामिदं तिलकोदं ( गंगाजलं वा ) तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः |

अमुक गोत्रः अस्मत्पितामह अमुक ( दादा का नाम ) रूद्ररुपस्तृप्यतामिदं तिलकोदं ( गंगाजलं वा )तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः |

अमुक गोत्रः अस्मत्प्रपितामह अमुक (परदादा का नाम ) आदित्यरुपस्तृप्यतामिदं तिलकोदं ( गंगाजलं वा )तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः |

अमुक गोत्रा अस्मत्माता अमुकी  ( माता  का नाम ) वसुरुपा तृप्यतामिदं तिलकोदं ( गंगाजलं वा ) तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः

अमुक गोत्रा अस्मत्पितामही अमुकी  ( दादी का नाम ) रूद्ररुपा तृप्यतामिदं तिलकोदं ( गंगाजलं वा ) तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः

अमुक गोत्रा अस्मत्प्रपितामही अमुकी  (परदादी का नाम ) आदित्य रुपा तृप्यतामिदं तिलकोदं ( गंगाजलं वा ) तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः, तस्यै स्वधा नमः

निम्नलिखित श्लोकों का उच्चारण करते हुए पितृ तीर्थ से तिल मिश्रित जल गिराएं

नरकेषु   समस्तेषु   यातनासु  च  ये स्थिता |

तेषामाप्यायनायैतद्दीयते    सलिलं     मया   ||

येऽबान्धवा बान्धवाश्च येऽन्यजन्मनि बान्धवाः  |

ते तृप्तिमखिला  यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति ||

ये  में  कुले  लुप्तपिंडाः  पुत्र  दार  विवर्जिता  |

तेषां   हि   दत्तमक्षय्यमिदमस्तु   तिलकोदं  ||

आ   ब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं   देवर्षिपितृ  मानवाः  |

तृप्यन्तु   पितरः  सर्वे   मातृमातामहादयाः   ||

इसके बाद सूर्य को ताम्बे के पात्र में जल,अक्षत तथा पुष्प डाल कर अर्घ्य प्रदान करें | सम्पूर्ण तर्पण कर्म को निम्नलिखित वाक्य से भगवान् को समर्पित करें —-

अनेन यथा शक्ति कृतेन देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणाख्येन कर्मणा भगवान् पितृ स्वरूपी जनार्दन वासुदेवः प्रीयतां न मम |ॐ तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु |

पितृ तर्पण के बाद आमंत्रित ब्राह्मण को पवित्र आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुख कर के आदरपूर्वक बिठा कर मौन भाव से मिष्टान्न सहित सात्विक भोजन खिलाएं | भोजन के बाद ब्राह्मण को दान दक्षिणा दे कर विदा करें तथा परिवार सहित भोजन करें |

श्राद्ध के आरम्भ व अंत में तीन तीन बार निम्नलिखित अमृत मन्त्र का उच्चारण करने से श्राद्ध का अक्षय फल प्राप्त होता है —-

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च |                  

नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः ||                          

श्राद्ध से सम्बंधित अन्य शास्त्र वचन

श्राद्ध व पितृ तर्पण में काले तिल एवम चांदी का प्रयोग पितरों को प्रसन्न करता है|  श्राद्ध में भोजन के समय  ब्राह्मण  एवम श्राद्धकर्ता का हंसना या बात चीत करना निषिद्ध है |

दक्षिणा के बिना श्राद्ध व्यर्थ है,मन्त्र ,काल व विधि की त्रुटि की पूर्ति दक्षिणा से हो जाती है अतः यथा शक्ति ब्राह्मण  को दक्षिणा दे कर आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें|

रात्रि में,दोनों संध्याओं में तथा पूर्वान्ह काल में श्राद्ध वर्जित है

कूर्म पुराण के अनुसार किसी अन्य की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए वन,पर्वत,तीर्थ तथा देव मंदिर पर सभी का स्वामित्व होता है अतः ये अन्य की श्रेणी में नहीं आते |

जिस श्राद्ध पर  रजस्वला स्त्री ,पतित मनुष्य व सूअर कि दृष्टि पड़  जाए वह व्यर्थ हो जाता है   बासी अन्न ,केश युक्त दूषित भोजन ,रसोई बनाते समय कलह ,श्राद्ध के समय मौन न रहना व दक्षिणा रहित होने पर श्राद्ध व्यर्थ होता है |     श्राद्ध करते समय भूमि पर जो भी पुष्प ,गंध,जल,अन्न गिरता है उस से पशु पक्षी ,सर्प,कीट,कृमि आदि योनियों में पड़े पितर तृप्ति प्राप्त करते हैं |

धन व ब्राह्मण के अभाव में ,परदेश में ,पुत्र जन्म के समय या किसी अन्य कारण से असमर्थ होने पर श्राद्ध में यथा शक्ति कच्चा अन्न ही प्रदान करे | काले तिल व जल से बायां घुटना भूमि पर लगा कर तथा यज्ञोपवीत या कपडे का साफा

दाहिने कंधे पर रख कर ,दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तथा अपने पितरों का नाम ,गोत्र बोलते हुए पितृ तीर्थ( अंगूठे और तर्जनी के मध्य ) से तीन –तीन  जलान्जलियाँ देने से ही पितर तृप्त हो जाते हैं तथा आशीर्वाद दे कर अपने लोक में चले जाते हैं | जो मनुष्य इतना भी नहीं करता उसके कुल व धन संपत्ति में वृद्धि नहीं होती तथा वह परिवार सहित सदा कष्टों से पीड़ित रहता है

जो व्यक्ति समयानुसार श्राद्धकर्म तथा पितरों की यथा सामर्थ्य पूजा करता है वह , पुत्र,यश,कीर्ति,पुष्टि,बल,श्री ,आयु,सुख और धनधान्य प्राप्त   करता है |

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The Importance and utility of Astrology


The Importance and utility of astrology

Astrology shows good and evil deeds ( karma)  of a person which are performed  by him in his earlier births and  also denotes the time of their impact  like a lamp which enables us to see the objects placed in darkness. .Many texts say that which is going to be happening cannot be averted and untoward cannot be happen because the fate is fixed and immutable. Here it is natural to question if good or evil results earned in our previous births to suffer in this life is certain then what the utility of having knowledge of astrology is. When we cannot change the outcome of an event whether it is good or evil why we should bother to know about future.  This question has only emphasized the strength of the fate while the impact of effort is not considered .If Fate is the only factor to decide our successes then the importance of efforts and deeds have not been stressed predominantly in so many places of our scriptures. Our fate which has been earned by us in previous births cannot be materialized without efforts.  On the contrary our efforts go without any positive good result many a times which is clearly due to the adversity of fate.  For example a farmer plows, sows, fertilizes, pour water and pesticides etc. all kind of works to grow grains in his farm .But if the untimely rain, hailstorm or other natural disaster destroys his crops then we would have to think that due to adversity of fate he did not get favorable results although he has work hard .

In fact the life of human is based on two cycles of a chariot which are luck and effort. Both cycles moves the Chariot. Both have equal importance. If a man’s horoscope, ominous portent or answer of his question indicates the lack of education, marriage or children in this life due to impact of his inauspicious deeds of previous births, he can remove that impact by means of donations, havans, chanting of specific mantras he can weaken the effects of those unsteady, inauspicious deeds performed by him. Scholar can change his weak destiny through his efforts and hard work. Sacrifice, charity, fasting, ritual chanting and special rituals are also various kinds of efforts described in the scriptures to reverse the adversity of fate into favorableness. Astrology tells us the time of good and bad fortune. When a specific period of adversity is known to us, we can counter that by some physical and spiritual efforts. For example seeing the signs of the coming rain we move with umbrella because it is not possible for us to stop the rain but we can defend ourselves with the help of umbrella.Vedas are the best and incomparable books of Hindu Sanatan culture which have glorious place in Indian culture. Brahma the Creator revealed Vedas from its mouth for well-being of human.  Vedas are the source of all the Indian disciplines having six organs 1.Education 2 kalp3.Vedic grammar 4 Nirukta 5 Verses 6 Astrology. To decide the appropriate time for Vedic rituals and yagy, astrology has the highest importance of all the six parts. ‘Jyotishamyanan chakṣu ‘ Astrology has been described as eyes of the Vedas.  Like everything appears to be bleak without eyes as well it is impossible to do all the Vedic and Scripture canonical functions without the knowledge of astrology.

Yatha   shikha Mayuranam Naganan  Mnyo  yatha  |

Tdvedvedangshastranam Jyotism Murdhni Sthitm ||                                                                                                                                        (Vedanga Astrology)

As crest of peacock and gem of serpent lies on their head, astrology has the highest place in organs of the Vedas like that.

Vifla      Nyanyshastrani    Viwadsteshu     Kevalam  |

Saflam Jyotism Shastrm Chandrarco yatr Sakshinu ||

(Shudhi Deepika)

All the classic texts are non apparent and often considered disputed except astrology .Astrology is called successful because luminaries are apparent.

Brahma Suryo Vshishto Atrirmnu Pulsty Romshau |

Mrichi   Angira    Wyaso Nard    Shauunko   Bhrigu  ||

Chyvno        Yvnon       Garg       Kshypsrch     Prashr   |

Ashtadshaite   Ganbhira   Jyoti shaastr    Prwartk   ||

(Narad Sanhita)

According to  seer Narad ,Brahma ,Sury Vshishth ,Atriri, Manu ,Pulsty , Romsh,Mareechi,Angira,Vyaas,Narad,Shaunak, Bhrigu ,Chyvan,   Yavan,  Garg,   Kshyap and Prashr  eighteen seers are founders of astrology. These sages create the principles of astrology with their tenacity, knowledge, insight and experience.

Sidhant sanhita hora  roopam skandtryatmkm  |

Vedsy   Nirmlnckshujyoti   shastr    Mnuttmm   ||

(Narada Samhita)

According to seer Narad there are three parts of astrology —–

1 Theory (principles or math)

2 Snhita (code)

3 Hora

1. Theory (principles or math) Calculation  from Truti to holocaust era , distinguished values of solar, lunar and stars etc.,regular or retrograde motions of the planets;  description of The Earth, the stars  the planets and astrolabe instrument is  called the theory of astrology .Varahamihira has mentioned five Mathematics Methods in his  book  PanchSiddhantika named Pitamah, Vasishta, Romak, Paulish and Sun. Arybttyym of Arya Bhatt , principle of  secret of universe of  Acharya Brhmsfut and Lilavati of Bhaskaracharya  are well known compositions in astrology on the basis of which several astrological theories have been discovered

2. Sanhita (code)Mathematics and results both subjects are included in the Code . Code-related literature is very wide in which mixture of topics related to both the world and the people are included. Planetary navigation  in constellation , inter-war of planets, violence, prognostic, effort, Ang vidya, auspicious time for functions, architectural lore, Eclipse, showers, match-making  argh kaand etc.are  described in sanhita or code.Brihat-Samhita, Bhadrbahu samhita,Vasishta  samhita and Narada Samhita  are some of the classical code texts.

3. Hora (predictive astrology)There are three parts of Hora1. Jataka2. Tajik 3. Question

1Jataka (native) In the Jatak all of the good or evil effects from birth to death is considered on the basis of horoscope of a native without the knowledge of which a person’s life seems full of absolute darkness. Brihatjatak of Varahamihira, Brihat Hora Shastra of Parashar, Faldeepika of Mntreshwar, Saravli of KalyanVarma, Jatak Parijata of vaidyanath, Hora Ratnam of Balbadhra and Chamatkaar Chintamani of Narayan Bhatt are some prominent native treatises.

2. Tajik Tajik shastr is a branch of astrology which mainly is influenced by YavanJyotish and in which Persian words are used commonly.  Varsh phal,Masik phal Saham phal etc.  are considered in Tajik shastr. Tajik Nilkanti of Neelkanth and Hayn Ratn are the main Tajik texts.

3.  Question  Question shastr is created to consider good or evil fate of those persons who do not remember their birth time exactly. Prediction is made on the basis of horoscope of the  exact time of question or first word pronounced by  the questioner  Davjyvllbha, Prashn Maarg, Prashn Bhushan, PrashnShiromani , Prashn Chandeshwar, Bhuvan Deepak etc. are famous astrological books related to question.In addition to these good or evil effect of a person is also considered  by means of Palmistry, vocal pedagogy, Ramal Jyotish etc.

Importance and utility

Astrology is extremely helpful from the beginning to the masses and in the context of today it is quite meaningful. Astrology helps us  telling our past, present and future.             ya brahmanaavilikhita narabhaalapatte praagjanm karm sadasatphalapaak shastih|

hora prakaashayati taamih varn panktim deepo yatha nishi ghataadikamandhakaare ||

Hora Shastra reveals good or evil fruits, earned by a person by his previous deeds (karmas) which are written on the forehead of the man, in a same manner as a lamp lights and shows the materials hidden in the darkness. Bhagavata Purana praises telling the importance of astrology as thus –

jyotishamayanam sakshat yattad gyanam  atindriyam |

praneetan  bhavata yen  pumaan  ved   paraavaram   ||

Astrology is place of consideration of enlighten planets and constellations and a scripture which provides insensible salvation.A human has to take next birth to enjoy good or evil fruits of his deeds of his previous births .Conditions of the planets, zodiac signs and constellations at birth time of a person are according to his deeds (karmas) Therefore, astrology shows the fruit of his previous actions through planets, zodiac signs and constellations.

nijaani bhaagyaanyavagantumuchchai raap tapyoraashi mapipratatartun |

dravyan tathopaarjayitun janaanaan horaan vina naany ihaastyupaayah ||                                                                                                                                          (Horamakarand )

No other shaster can be as helpful as Hora Shastra to know his own destiny, to gain money or to cross the ocean of adversity.

Vnm Smashrita Yeapi Nirmma Nishprigrha |

Api  te Priprichcnti Jyotisham Gtikovidm ||

(Brihat Sanhita)

The housefathers who went into the forest abandoning life and are devoid of attachment and affection, they also question astrologer about themselves then what to say about ordinary humans.

N Sanwatsr Pathi ch  Nrkeshuppdyte  |

Brhmloke Pratishtam  ch Lbte Devcintkah ||

(Brihat Sanhita)                                                                                                The person who has the knowledge of astrology does not receive the hell. Fortune teller receives dignity in BrahmLok

Grhadhinan   Jagtsrwn   Grhadhina  Nravra  |

Kalgyanam Grhadhinam Grha Karmflprada ||

(Brihat Sanhita)

This whole world is subject to the planets, all the human are subject to planets, knowledge of the time is subject to the planets and planets provide the fruit of the action.

Bhutm  chaiv  Bhvishym   ch  vartman  tathaiv  ch |

SarvpradrshkamShastrmSiddhidmMoksh Karnm ||

(lomash Sanhita)

Astrology is a guide of all past, present, future and salvation.Astrology provides us knowledge of date, day, week, paksh (fifteen days), month, udder (Ayan), season, year, etc. which are very useful for our behavior and dealings.  Therefore it is called determinative scripture of period. Being a source of sheen it is divine light beam for humans who are scattered in the dark paths of life   and makes their life path illuminated by divine light. The task of paving the way is done by this science while solving all the problems of human beings from birth till death. Astrology expresses all the position of the past, vision of future and otherworld -rebirth.  Astrology determines auspicious moments for all the earthly, extraterrestrial functions and a work done in an auspicious moment always get success.When and which type of pleasure or pain, good or bad will come to a man, its indicator is astrology. Good or evil fruits of all life based on the status of planets at time of birth has been described in the astrological texts. Time of auspicious or inauspicious incidents can be known with the help of Vinshottri dasha system, transit of planets and Ashtkwarg system. This prior knowledge provides of the person enthusiasm and will power in the favorable results and offers the opportunity to eliminate or to reduce the bad effects remaining vigilant and try chanting, charity and virtue more and more in the adverse results.

In ancient times, knowledge of astrology was given to students with other disciplines in seminaries which they use to utilize in the interest of the general public. Foreign invaders destroyed our rare literature to destroy our culture .Literature which is available today is incomplete and in fragmented state. For the development of any learning, a constantly contemplate, debate and lot of exploration is required in order to keep it in line with the changing society. Astrology requires this kind of Continued exploration which can only be possible when this is to be included in the curriculum of universities and there should be attempts to review the old theories and to discover the new principles. Only then there will be possibility to develop further this Indian lore.

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आपकी जन्म अथवा नाम राशि के अनुकूल रंग


आपकी जन्म अथवा नाम राशि के अनुकूल रंग

रंगों का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है। हम अपने चारों ओर के  अनेक  रंगों से प्रभावित होते हैं। मूल रूप से इन्द्रधनुष  के सात रंगों को ही रंगों का जनक माना जाता है, ये सात रंग लालनारंगीपीलाहराआसमानीनीला तथा बैंगनी हैं। रंगों की उत्पत्ति का  प्राकृतिक स्रोत सूर्य का प्रकाश है|  प्रकृति की सुन्दरता अवर्णनीय है और रंग ही  इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगाते है । सूर्य की लालिमा हो या खेतों की हरियाली, आसमान का नीलापन या मेघों का कालापन, वर्षा  के बाद में बिखरती इन्द्रधनुष की अनोखी छटा, बर्फ़ की सफ़ेदी और ऐसे  कितने ही ख़ूबसूरत दृश्य  हैं  जो हमें प्रफुल्लित कर देते हैं । इस आनंद का रहस्य  है  रंगों की अनुभूति। मानव जीवन रंगों के बिना उदास और सूना है| व्यक्ति पर उसके द्वारा प्रयोग किये जाने वाले तथा उसके आस पास के रंगों का बहुत असर पड़ता है | रंगों के इस महत्व को समझ कर ही हमारे ऋषियों ने धार्मिक अनुष्ठानों  में विभिन्न रंगों के प्रयोग का समावेश किया है | कुमकुम ,हल्दी ,मेहँदी ,गुलाल को धार्मिक कार्यों में प्रयोग किया जाता है | नव ग्रह पूजन में सूर्य  और मंगल को लाल रंग से ,चन्द्र और शुक्र को श्वेत रंग से ,बुध को हरे रंग से ,गुरु को पीले रंग से ,शनि तथा राहू –केतु को काले रंग से प्रदर्शित किया जाता है |  हमारे शरीर पर रंगों का प्रभाव बहुत ही सूक्ष्म प्रक्रिया से होता हैं | आज कल पाश्चात्य चिकित्सा में भी रंगों के प्रयोग पर अनुसंधान किया जा रहा है   जिसका  बहुत सकारात्मक परिणाम मिल रहा  है |

नीचे आपकी राशि के अनुकूल तथा प्रतिकूल रंगों का वर्णन किया गया है | अपनी राशि के अनुकूल रंग का अपने जीवन में अधिक प्रयोग करने पर आपको सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होगी|

जिनकी जन्म या नाम राशि मेष  है उनके  लिए लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग अनुकूल हैं  ।  नीले, स्लेटी  और काले  ओर  हरे  रंग के प्रयोग से बचें|
जिनकी जन्म या नाम राशि वृष है  उनके  लिए हरा,श्वेत ,मिश्रित रंग,नीला ,स्लेटी,काला ,आसमानी ,जामुनी रंग अनुकूल हैं | लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग का प्रयोग कम करें |

जिनकी जन्म या नाम राशि मिथुन है उनके  लिए हरा,श्वेत ,मिश्रित रंग,नीला ,स्लेटी,काला ,आसमानी ,जामुनी रंग अनुकूल हैं | लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग का प्रयोग कम करें |
जिनकी जन्म या नाम राशि कर्क है उनके लिए लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग अनुकूल हैं  ।  नीले, स्लेटी, हरे और काले रंग के प्रयोग से बचें|

जिनकी जन्म या नाम राशि सिंह  है उनके  लिए लाल, पीला,हरा , नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग अनुकूल हैं  ।  नीले, स्लेटी  और काले रंग के प्रयोग से बचें|

जिनकी जन्म या नाम राशि कन्या है  उनके  लिए हरा ,नीला ,स्लेटी,काला ,आसमानी ,जामुनी रंग अनुकूल हैं | लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग का प्रयोग कम करें |

जिनकी जन्म या नाम राशि  तुला है  उनके  लिए हरा,श्वेत ,मिश्रित रंग,नीला ,स्लेटी,काला ,आसमानी ,जामुनी रंग अनुकूल हैं | लाल, पीला, नारंगी,गुलाबी रंग का प्रयोग कम करें |

जिनकी जन्म या नाम राशि वृश्चिक  है उनके  लिए लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग अनुकूल हैं  ।  नीले, स्लेटी  और काले रंग के प्रयोग से बचें|

जिनकी जन्म या नाम राशि धनु है उनके  लिए लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग अनुकूल हैं  ।  नीले, स्लेटी ,हरे  और काले रंग के प्रयोग से बचें |

जिनकी जन्म या नाम राशि मकर है उनके  लिए हरा ,मिश्रित रंग,नीला ,स्लेटी,काला ,आसमानी ,जामुनी रंग अनुकूल हैं लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग का प्रयोग कम करें |

जिनकी जन्म या नाम राशि कुम्भ  है उनके  लिए हरा,नीला ,स्लेटी,काला ,आसमानी ,जामुनी रंग अनुकूल हैं | लाल, पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग का प्रयोग कम करें |

जिनकी जन्म या नाम राशि मीन है उनके  लिए लाल, भूरा , पीला, नारंगी,श्वेत ,गुलाबी रंग अनुकूल हैं  । नीले,  हरे ,स्लेटी और काले रंग के प्रयोग से बचें|

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2015 in review


The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2015 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The concert hall at the Sydney Opera House holds 2,700 people. This blog was viewed about 56,000 times in 2015. If it were a concert at Sydney Opera House, it would take about 21 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

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