राहु पुराणों और ज्योतिष शास्त्र में

राहु पुराणों और ज्योतिष शास्त्र में

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी दनु से विप्रचित्ति नामक पुत्र हुआ जिसका विवाह हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका से हुआ | राहु का जन्म सिंहिका के गर्भ से हुआ इसीलिए राहू का एक नाम सिंहिकेय भी है | जब भगवान विष्णु की प्रेरणा से देव दानवों ने क्षीर सागर का मंथन किया तो उस में से अन्य रत्नों के अतिरिक्त अमृत की भी प्राप्ति हुई | भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवों व दैत्यों को मोह लिया और अमृत बाँटने का कार्य स्वयम ले लिया तथा पहले देवताओं को अमृत पान कराना आरम्भ कर दिया| राहु  को संदेह हो गया और वह देवताओं का वेश धारण करके सूर्य देव तथा चन्द्र देव के निकट बैठ गया |विष्णु जैसे ही राहु को अमृत पान कराने लगे सूर्य व चन्द्र ने जो राहु को पहचान चुके थे विष्णु को उनके बारे में सूचित कर दिया |भगवान विष्णु ने उसी समय सुदर्शन चक्र द्वारा राहु के मस्तक को धड से अलग कर दिया |पर इस से पहले अमृत की कुछ बूंदें राहु के गले में चली गयी थी जिस से वह सर तथा धड दोनों रूपों में जीवित रहा |सर को राहु तथा धड को केतु कहा जाता है

राहु व केतु को ग्रहत्व की प्राप्ति

राहु के मस्तक कटते  ही देवों व दानवों में महा संग्राम छिड़ गया |राहु और केतु सूर्य व चन्द्र से बदला लेने के उद्देश्य से ग्रसित करने के लिए उनके पीछे दोडे| भयभीत हो कर चंद्रमा शिव की शरण में चला गया |आशुतोष ने चन्द्र को अपने मस्तक पर धारण कर लिया | राहु ने भगवान शंकर की स्तुति की और अपना ग्रास चन्द्र देने की प्रार्थना की |शिव ने प्रसन्न होकर राहु और केतु दोनों को नवग्रह मंडल में स्थान दिया तथा समस्त लोकों में पूजित होने का वर दिया |

राहु का स्वरूप और प्रकृति

मत्स्य पुराण के अनुसार  राहु विकराल मुख का ,नील वर्ण ,हाथ में तलवार ,ढाल ,त्रिशूल व  वर मुद्रा धारण किये है | इसकी वात प्रकृति है |इसे दूसरों के अभिप्राय को जान लेने वाला तीव्र बुद्धि का कहा गया है |सर्वमान्य ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार राहु अशुभ ,क्रूर ,मलिंरूप वाला ,अन्त्यज जाति का , दीर्घ सूत्री ,नील वर्ण का तथा तीव्र बुद्धि का माना गया है |

राहु का रथ एवम गति

पुराणों के अनुसार राहु का रथ तमोमय है जिसको काले रंग के आठ अश्व खींचते हैं |इसकी गति सदैव वक्री रहती है |एक राशि को यह अठारह मास में भोग करता है |अमावस्या में पृथ्वी और सूर्य के मध्य राहु रुपी चन्द्र छाया आने पर सूर्य का बिंब अदृश्य हो जाता है जिसे सूर्य ग्रहण कहते हैं |

कारकत्व

 प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथोंके अनुसार राहु सांप,सपेरे,कीट,विष,जूआ , कुतर्क,अपवित्रता असत्य वादन ,नैऋत्य दिशा ,सोये हुए प्राणी ,वृद्ध , ,दुर्गा की उपासना ,ढीठ पना , चोरी ,आकस्मिक प्राकृतिक घटनाएं ,मद्य पान ,मांसाहार  ,वैद्यक ,हड्डी ,गुप्तचर ,गोमेद ,रांगा ,मछली व नीले पदार्थों का कारक है |

रोग  

जनम कुंडली में  राहु पाप ग्रहों से युत  या दृष्ट हो , छटे -आठवें -बारहवें  भाव में स्थित हो तो चर्म रोग,शूल,अपस्मार ,चेचक वात शूल, दुर्घटना, कुष्ठ ,सर्प दंश ,हृदय रोग,पैर में चोट तथा अरुचि इत्यादि रोग होते हैं |

फल देने का समय

राहु  अपना शुभाशुभ फल  42 से 48 वर्ष कि आयु में , अपनी दशाओं व गोचर में प्रदान करता है |वृद्धावस्था पर भी  इस का अधिकार कहा गया है |

राहु का राशि फल

जन्म कुंडली में राहु  का मेषादि राशियों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :-

मेष में –राहु हो तो जातक तमोगुणी ,क्रोध की अधिकता से दंगा फसाद करने वाला तथा जूए लाटरी में धन नष्ट करने वाला होता है |आग और बिजली से भय रहता है |

वृष   में  राहु   हो तो जातक सुखी ऐश्वर्यवान,सरकार से पुरस्कृत ,कामी और विद्वान होता है |

मिथुन में राहु  हो तो जातक विद्वान ,धन धान्य से सुखी ,समृद्ध व् यश मान प्राप्त करने वाला होता है |

कर्क में  राहु   हो तो जातक मनोरोगी ,नजला जुकाम से पीड़ित ,माता के कष्ट से युक्त होता है |

सिंह में राहु  हो तो जातक ह्रदय या उदररोगी राजकुल का विरोधी तथा अग्नि विष आदि से कष्ट उठाने वाला होता है | |

कन्या में राहु हो तो जातक विद्यावान,मित्रवान, साहस के कार्यों से लाभ उठाने वाला तथा सफलता प्राप्त करने वाला होता है |

तुला मे राहु हो तो जातक गुर्दे के दर्द से पीड़ित ,व्यापार से लाभ उठाने वाला होता है |

वृश्चिकमेंराहु  हो तो जातक नीच संगति वाला ,शत्रु से पीड़ित ,दुःसाहसी व् अग्नि विष शस्त्र आदि से पीड़ित होता है |

धनु में राहु हो तो जातक असफल ,परेशान,वात रोगी , निम्न कार्यों में रूचि लेने वाला होता है |

मकर में  राहु  हो तो जातक विदेश यात्रा करने वाला ,धनी,घुटने से पीड़ित और मित्र से हानि उठाने वाला होता है |

कुम्भ  में राहु  हो तो जातक श्रम के कार्य से लाभ उठाने वाला ,मित्रों से सहयोग लेने वाला ,धन संपत्ति से युक्त होता है |

मीन  में  राहु  हो तो जातक उत्साह हीन ,मन्दाग्नि युक्त होता है |

(राहु पर किसी अन्य शुभाशुभ ग्रह कि युति या दृष्टि के प्रभाव से उपरोक्त राशि फल में शुभाशुभ परिवर्तन भी संभव है )

राहु का भाव फल

जन्म कुंडली में राहु  का विभिन्न भावों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :

लग्न में स्थित राहु से जातक शत्रु विजयी ,अपना काम निकाल लेने वाला ,कामी ,शिरो वेदना से युक्त,आलसी,क्रूर,दया रहित,साहसी,अपने सम्बन्धियों को ही ठगने वाला ,दुष्ट स्वभाव का ,वातरोगी होता है |

धन भाव में स्थित राहु से जातक असत्य बोलने वाला ,नष्ट कुटुंब वाला ,अप्रिय भाषण कर्ता,निर्धन ,परदेस में धनी,कार्यों में बाधाओं वाला,मुख व नेत्र रोगी ,अभक्ष्य पदार्थों का सेवन करने वाला होता है

पराक्रम भाव में स्थित राहु से जातक पराक्रमी ,सब से मैत्री पाने वाला ,शत्रु को दबा कर रखने वाला ,कीर्तिमान ,धनी ,निरोग होता है | निर्बल और पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट होने पर छोटे भाई के सुख में कमी करता  है |

सुख भाव में स्थित राहु से जातक की माता को कष्ट रहता है |मानसिक चिंता रहती है |प्रवासी तथा अपने ही लोगों से झगड़ता रहता है |

संतान भाव में स्थित राहु से संतान चिंता ,उदर रोग ,शिक्षा में बाधा ,वहम का शिकार होता है |

शत्रु भाव में स्थित राहु से जातक रोग और शत्रु को नष्ट करने वाला ,पराक्रमी ,धनवान ,राजमान्य ,विख्यात होता है |

जाया भाव में स्थित राहु से  विवाह में विलम्ब या बाधा ,स्त्री को कष्ट ,व्यर्थ भ्रमण ,कामुकता  ,मूत्र विकार ,दन्त पीड़ा तथा प्रवास में कष्ट उठाने वाला होता है |

आयु भाव में स्थित राहु से पैतृक धन संपत्ति की हानि,कुकृत्य करने वाला ,बवासीर का रोगी ,भारी श्रम से वायु गोला ,रोगी तथा 32 वें वर्ष में कष्ट प्राप्त करने वाला होता है |

भाग्य भाव में स्थित राहु से विद्वान ,कुटुंब का पालन करने वाला ,देवता और तीर्थों में विशवास करने वाला ,कृतज्ञ ,दानी ,धनी, सुखी होता है |

कर्म भाव में स्थित राहु से अशुभ कार्य करने वाला ,घमंडी ,झगडालू ,शूर ,गाँव या नगर का अधिकारी ,पिता को कष्ट देने वाला होता है |

लाभ भाव में स्थित राहु से पुत्रवान ,अपनी बुद्धि से दूसरों का धन अपहरण करने वाला ,विद्वान ,धनी ,सेवकों से युक्त,कान में पीड़ा वाला ,विदेश से लाभ उठाने वाला होता है |

व्यय भाव में स्थित राहु से दीन, पसली में दर्द से युक्त ,असफल ,दुष्टों का मित्र ,नेत्र व पैर का रोगी,कलहप्रिय,बुरे कर्मों में धन का व्यय करने वाला ,अस्थिर मति का होता है |

 

राहु  का सामान्य  दशा फल

जन्म कुंडली में राहु स्व ,मित्र ,उच्च राशि -नवांश का  ,शुभ युक्त -दृष्ट ,लग्न से शुभ स्थानों पर हो, केन्द्रेशसे त्रिकोण में या त्रिकोणेश से केन्द्र में युति सम्बन्ध बनाता हो तो राहु  की दशा में बहुत सुख ,ज्ञान वृद्धि ,धन धान्य की वृद्धि ,पुत्र प्राप्ति ,राजा और मित्र सहयोग से अभीष्ट सिद्धि ,विदेश यात्रा ,प्रभाव में वृद्धि, राजनीति और कूटनीति में सफलता तथा सभी प्रकार के सुख वैभव प्रदान करता है |

राहु  शत्रु –नीचादि राशि का पाप युक्त,दृष्ट हो कर 6-8-12 वें स्थान पर हो तो उसकी अशुभ दशा में सर्वांग पीड़ा ,चोर –अग्नि –शस्त्र से भय ,विष या सर्प से भय ,पाप कर्म के कारण बदनामी,असफलता ,विवाद ,वहम करने की मनोवृत्ति ,कुसंगति से हानि ,वात तथा त्वचा रोग ,दुर्घटना से भय होता है |

गोचर में राहु

जन्म या नाम राशि से 3,6 ,11वें स्थान पर राहु  शुभ फल देता है |शेष स्थानों पर राहु का भ्रमण अशुभ कारक  होता है |

जन्मकालीन चन्द्र से प्रथम स्थान पर  राहु का गोचर सर पीड़ा ,भ्रम ,अशांति , विवाद और वात पीड़ा करता है

दूसरे स्थान पर राहु  के गोचर से घर में अशांति और कलह क्लेश होता है |चोरी या ठगी से  धन कि हानि ,नेत्र या दांत में कष्ट होता है | परिवार से अलग रहना पड़ जाता है |

तीसरे स्थान पर राहु  का गोचर आरोग्यता , मित्र  व व्यवसाय लाभ ,शत्रु की पराजय ,साहस पराक्रम में वृद्धि ,शुभ समाचार प्राप्ति ,भाग्य वृद्धि ,बहन व भाई के सुख में वृद्धि व राज्य से सहयोग दिलाता  है |

चौथे स्थान पर राहु  के  गोचर से कुसंगति , स्थान हानि  ,स्वजनों से वियोग या विरोध ,सुख हीनता ,मन में स्वार्थ व लोभ का उदय , वाहन से कष्ट ,छाती में पीड़ा होती है |

पांचवें स्थान पर  राहु  के  गोचर से भ्रम ,योजनाओं में असफलता ,पुत्र को कष्ट, धन निवेश में हानि व उदर विकार होता है |शुभ  राशि में शुभ युक्त या शुभ दृष्ट  हो तो सट्टे लाटरी से लाभ कराता है |

छ्टे स्थान पर  राहु  के गोचर से धन अन्न व सुख कि वृद्धि ,आरोग्यता , शत्रु पर विजय व संपत्ति का लाभ, मामा या मौसी को कष्ट  होता है |

सातवें स्थान पर  राहु  के  गोचर से दांत व  जननेंन्द्रिय सम्बन्धी रोग , मूत्र विकार ,पथरी ,यात्रा में कष्ट , दुर्घटना ,स्त्री को कष्ट या उस से विवाद , आजीविका में बाधा होती है|

आठवें स्थान पर राहु  के गोचर से धन हानि ,कब्ज ,बवासीर इत्यादि गुदा रोग ,असफलता ,स्त्री को कष्ट ,राज्य से भय ,व्यवसाय में बाधा ,पिता को कष्ट ,परिवार में अनबन ,शिक्षा प्राप्ति में बाधा व संतान सम्बन्धी कष्ट होता है |

नवें  स्थान पर राहु के  गोचर से भाग्य कि हानि ,असफलता ,रोग व शत्रु का उदय ,धार्मिक कार्यों व यात्रा में बाधा आती है |

दसवें  स्थान पर राहु  के  गोचर से मानसिक चिंता , अपव्यय ,पति या पत्नी  को कष्ट ,  कलह,नौकरी व्यवसाय में विघ्न , अपमान ,कार्यों में असफलता ,राज्य से परेशानी होती है |

ग्यारहवें स्थान पर राहु  के गोचर से धन ऐश्वर्य की वृद्धि ,सट्टे लाटरी से लाभ ,आय में वृद्धि ,रोग व शत्रु से मुक्ति , कार्यों में सफलता, मित्रों का सहयोग मिलता है |

बारहवें स्थान पर  राहु  के  गोचर  से धन कि हानि ,खर्चों कि अधिकता ,संतान को कष्ट ,प्रवास , बंधन ,परिवार में अनबन व भाग्य कि प्रतिकूलता होती है |

( गोचर में राहु के उच्च ,स्व मित्र,शत्रु नीच आदि राशियों में स्थित होने पर , अन्य ग्रहों से युति ,दृष्टि के प्रभाव से या वेध स्थान पर शुभाशुभ ग्रह होने पर उपरोक्त गोचर फल में परिवर्तन संभव है | )

कालसर्प दोष

कुछ आधुनिक ज्योतिषियों ने गत कुछ वर्षों से यह भ्रामक प्रचार किया है की जब कुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य में आ जाएँ तो काल सर्प योग बनता है जिसका प्रभाव जातक पर बड़ा अशुभ पड़ता है | वास्तविकता यह है कि पराशर होरा शास्त्र ,बृहज्जातक ,सारावली ,मानसागरी,फलदीपिका ,जातक पारिजात आदि किसी भी वैदिक शास्त्रीय ज्योतिष ग्रन्थ  में ऐसे किसी कुयोग का  कहीं वर्णन नहीं है| साथ ही जीवन में सभी प्रकार से सफलता पाने वाले असंख्य ऐसे  व्यक्ति हैं जिनकी कुंडली में यह कुयोग है पर फिर भी वे सफलता के शिखर पर पहुंचे|मार्तंड पंचांगकार ने इस विषय पर 2011-12 के पंचांग में विस्तृत लेख लिखा है तथा कालसर्प योग में जन्में कुछ महान व्यक्तियों कि सूची दी है जिसमें सम्राट हर्ष वर्धन ,अब्राहम लिंकन ,जवाहर लाल नेहरु ,डा ० राधा कृष्णन ,अभिनेता दलीप कुमार व अशोक कुमार, धीरू भाई अम्बानी इत्यादि शामिल हैं | अतः इस योग से भयभीत करने वाले पाखंडी ज्योतिषियों से दूर रहें और उनकी बातों में आ कर धन को व्यर्थ में न गवाएं |

राहु शान्ति के उपाय
जन्मकालीन राहु  अशुभ फल देने वाला हो या गोचर में अशुभ कारक हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है |
रत्न धारण –गोमेद पञ्च धातु की अंगूठी में आर्द्रा,स्वाती या शतभिषा नक्षत्र  में जड़वा कर शनिवार  को  सूर्यास्त  के बाद  पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ  भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , नीले पुष्प,  काले तिल व अक्षत आदि से पूजन कर लें|रांगे का छल्ला धारण करना भी शुभ रहता है |

दान ,जाप –   | ॐ  भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः मन्त्र का १८००० की संख्या में जाप करें | शनिवार को काले उडद ,तिल ,तेल ,लोहा,सतनाजा ,नारियल  ,  रांगे की मछली ,नीले   रंग का वस्त्र इत्यादि का दान करें | मछलियों को चारा देना भी राहु शान्ति का श्रेष्ठ उपाय है |

About kantkrishan

I have written many books on astrology like 1 Janam kundli Phalit Darpan 2 Prashan Phal Nirnay 3 Brihat Jyotish Gian 4 VimshottaryIDasha Phal Nirnay all from Manoj publications Burari Delhi. My articles on predictive astrology have been published in many renowned magzines like Kalyan( Gorakhpur),kadambni etc. I have started a new sereies' falit jyotish ka saral gyan ' on my this blog for the people who have keen interest in predictive vaidic astrology.My services are available online for analysis of horoscopes,match-making,Muhurat and other fields related to astrology I am also available on Tweet http://vaidicastrology.twitter.com/
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राहु पुराणों और ज्योतिष शास्त्र में को 4 उत्तर

  1. Ritu Singh कहते हैं:

    ye leekh mujhe anya sabhi lekho se kafi jyada acha laga jo rahu maharaj ke bare mein likhe gaye hai… Upayo ke liye apka bahut Dhanyawad.

  2. Dr.Balvinder Aggarwal कहते हैं:

    प्रिय वर : हरी ॐ तत्सत आपका लेख अति सुंदर एवं उपयोगी है अतः में इसका प्रयोग अपने ज्योतिष विद्यार्थियों के ज्ञान वृध्ही के लिए कर रहा हूँ क्षमा करें कोई और आवश्यक जानकारी आप हमारे पाठकों को देना चाहें कृपया मेल करें एक बार फिर साधुवाद

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