फलित ज्योतिष का सरल ज्ञान

फलित ज्योतिष का सरल ज्ञान

(भाग 3)

(भाग 2 में जन्मकुंडली तथा बारह राशियों के बारे में बताया गया था | इस प्रकरण में लग्न-धनादि 12 भावों के विषय में विस्तार से बताया जाएगा |  )

कुंडली में लग्न अर्थात प्रथम भाव (1st house) से आरम्भ करके बाएं और से कुल 12 खाने हैं जिन्हें भाव( house) कहा जाता है | प्रत्येक भाव 30 अंश का होता है |दो भावों के मध्य की रेखा को संधि कहते हैं | इस प्रकार प्रत्येक भाव के आगे और पीछे संधि रेखा है |  जन्मकालिक या प्रश्नकालिक स्पष्ट लग्न के अंश –कला आदि  भाव का मध्य बिंदु होते हैं जिन से 15 अंश आगे और 15 अंश पीछे संधि  रेखा  तथा 30 अंश आगे और 30 अंश पीछे अगले और पिछले भाव का मध्य होता है |

Image (10)

उदाहरण के लिए मान लो लग्न स्पष्ट 6-10-26-46 है |  यह प्रथम भाव अथवा लग्न का भाव मध्य बिंदु होगा |इसमें पहला अंक गत राशि का है जिस से अगली राशि के अंक को हम प्रथम भाव अर्थात लग्न में लिखते हैं | 6 अंक कन्या राशि का है अतः इस से अगला अंक 7 जो वर्तमान लग्न  तुला राशि का अंक है लग्न में लिखेंगे | इसके आगे के अंक  लग्न के बीते हुए अंश –कला –विकला के हैं| इसका अर्थ है की उस समय तुला राशि का लग्न था जिसके 10 अंश,26 कला और 45 विकला निकल चुके हैं और 46 विकला पर वर्तमान लग्न है | एक राशि में 30 अंश ,एक अंश में 60 कला और एक कला में 60 विकला होती हैं  |लग्न स्पष्ट  में 30 अंश अर्थात 1 राशि जोड़ने पर 7-10-26 -46 दूसरा भाव मध्य स्पष्ट होगा | इसी प्रकार प्रत्येक भाव मध्य में एक राशि जोड़ने पर अगला भाव मध्य स्पष्ट करते हुए 12 भाव स्पष्ट हो जाते हैं |लग्न में 15 अंश जोड़ने पर 6-25-26-46 पहले और दूसरे भाव के बीच की संधि रेखा स्पष्ट होगी |इसी प्रकार अन्य भावों के मध्य की संधि रेखा को भी  स्पष्ट कर सकते हैं | भाव स्पष्ट करने की यह सम भाव प्रणाली प्राचीन एवम वैदिक है |आज कल यवन आचार्यों द्वारा प्रभावित असमान भाव प्रणाली ही अधिक प्रचलित है जिसमें लग्न की तरह दशम भाव को भी स्पष्ट करके बाकी सभी भाव गणित द्वारा साधित किये जाते हैं | वर्तमान सॉफ्टवेयर इसी पद्यति का अनुकरण करते हैं जिसमें सभी भाव समान नहीं होते|

भाव तथा संधियों को ग्पष्ट करने का अभिप्राय क्या है –यह समझते हैं | भाव फल की मात्रा को निर्धारित करने के लिए भावों  तथा संधियों को स्पष्ट करना आवश्यक होता है |  भाव  में स्थित जिस ग्रह  के  स्पष्ट अंश कला आदि   भाव मध्य के समान होंगे वह उस भाव से सम्बंधित शुभाशुभ फल 100 प्रतिशत करेगा | संधि रेखा पर स्थित ग्रह का भाव फल शून्य होता है | मध्य में स्थित ग्रह के भाव फल का निश्चय अनुपात से कर लेना चाहिए | जिस ग्रह के अंश कला आदि  आगे की संधि से अधिक हों तो ग्रह अगले भाव का तथा पीछे की संधि से कम हों तो पिछले भाव का शुभाशुभ फल करेगा  | भाव फल निर्धारित करने के विशिष्ट सूत्रों का वर्णन बाद में किया जाएगा |

संसार के सभी चर-अचर,जीव-निर्जीव प्राणियों और पदार्थों का चिन्तन कुंडली के  इन्हीं 12 भावों से किया जाता है | भावों में जो अंक प्रदर्शित किये गये हैं वे मेष आदि राशियों के क्रमांक हैं  जैसे पहले भाव अर्थात लग्न में 7  अंक दिखाया गया है |यह पहले  ही बताया गया है कि जन्म या प्रश्न  के समय जो राशि पूर्वी क्षितिज पर उदित होती है उस राशि के क्रमांक को कुंडली के पूर्व दिशा में स्थित पहले भाव  (1st house) लग्न  में लिखा जाता है तथा  उस से आगे की राशियों के क्रमांक  क्रमानुसार  बाएं और से कुंडली के  शेष भावों (house) में लिखा जाता है | सूर्यादि ग्रहों का चार भी कुंडली के भावों और राशियों में दायें से बाएं और (anticlockwise) रहता है | किस भाव से किस पदार्थ के विषय में विचार किया जाता है यह निम्नलिखित प्रकार से है जिन्हें बार बार पढ़ कर स्मरण कर लेना चाहिए |                                                                                                                              भावों (Houses) से विचारित विषय

पहला भाव (1st house)

पहले भाव को ही लग्न कहा जाता है | जन्म कुंडली में सबसे पहले बालक या बालिका की जन्म तिथि , जन्म समय और जन्म स्थान के अक्षांश –रेखांश के  आधार पर  विशेष गणितीय  प्रक्रिया से लग्न  स्पष्ट किया जाता है | लग्न में स्थित राशि के स्वामी को लग्नेश कहा जाता है | लग्न से आकृति,कद, आयु,वर्ण,शारीरिक स्वास्थ्य, सिर पीड़ा,गुण स्वभाव,सिर,चरित्र,बाल्यावस्था ,सुख-दुःख,दादी,नाना आदि का विचार किया जाता है |

दूसरा भाव (2nd house)

दूसरे भाव को धन भाव कहा जाता है जिसमें  स्थित राशि के स्वामी को धनेश कहा जाता है |धन भाव  से धन ,चल संपत्ति ,वाणी,मुख ,चेहरा,पारिवारिक सुख,खान –पान ,स्वर्णादि धातुएं,नेत्र,आभूषण , संतान का व्यवसाय ,क्रय-विक्रय आदि  का विचार किया जाता है |

तीसरा भाव (3rd house)

तीसरे भाव को पराक्रम कहा जाता है जिस में स्थित राशि के स्वामी को तृतीयेश या सह्जेश  कहा जाता है| इस भाव  से साहस,धैर्य , छोटे भाई-बहिन ,कान,बाजू,गले एवम  श्वास  के रोग, हाथ,शुभाशुभ समाचार,पति/पत्नी का भाग्य ,पिता की बीमारी अथवा शत्रु आदि का विचार किया जाता है |

चौथा भाव (4thhouse)

चौथे भाव को सुख  कहा जाता है जिस में स्थित राशि के स्वामी को चतुर्थेश या सुखेश  कहा जाता है | इस भाव से माता ,सुख,अचल संपत्ति,छाती ,हृदय ,फेफड़े,वाहन,जल,जनप्रियता,मन ,श्वसुर,मनोरथ,खेत,बाग़,मित्र,सम्बन्धी आदि का विचार किया जाता है |

पांचवां भाव ( 5thhouse)

पांचवें भाव को सुत तथा धी कहा गया है जिस में स्थित राशि के स्वामी को पंचमेश या सुतेश कहा जाता है|इस भाव  से संतान,बुद्धि, योग्यता,शिक्षा,इष्ट देवता,लाटरी,जिगर,उदर ,लेखन,प्रबंध ,पिता की आयु ,पत्नी की आय इत्यादि का विचार किया जाता है |

छटा भाव ( 6thhouse)

छ्टे भाव को शत्रु कहा गया  है जिस  में स्थित राशि के स्वामी को षष्टेश या रोगेश  कहा जाता है| इस भाव से रोग,शत्रु,मामा,मौसी,चोट,मुकद्दमा ,अंग-भंग ,जेलयात्रा ,ऋण ,कमर,आंत आदि का विचार किया जाता है |

सातवाँ भाव ( 7thhouse)

सातवें भाव को काम कहा गया है जिस में स्थित राशि के स्वामी को सप्तमेश या कामेश  कहा जाता है| इस भाव से काम सुख ,विवाह,दाम्पत्य जीवन,यात्रा,व्यापार,पति अथवा पत्नी , साझेदारी ,मूत्राशय ,पुरुष और स्त्री के प्रजनन अंग इत्यादि का विचार किया जाता है |

आठवाँ भाव ( 8thhouse)

आठवें भाव को मृत्यु  कहा गया है जिसमें स्थित राशि के स्वामी को अष्टमेश या रंध्रेश कहा गया है | इस भाव से आयु ,मृत्यु ,मृत्यु का कारण,गुदा ,दुर्घटना ,गुप्त धन ,दीर्घकालिक रोग,वसीयत-बीमा,जीवन साथी का धन तथा वाणी  आदि का विचार किया जाता है |

नवां भाव ( 9thhouse)

नवेँ भाव को धर्म और  भाग्य कहा गया है जिसमें स्थित राशि के स्वामी को नवमेश या भाग्येश कहा जाता है |इस भाव से धर्म, भाग्य ,पुण्य,तीर्थ यात्रा,आध्यात्म ज्ञान,गुरु,जांघ ,साला या साली,पौत्र या पौत्री आदि का विचार किया जाता है |

दशम भाव ( 10thhouse)

दसवें भाव को  पिता ,कर्म और राज्य कहा गया है  जिसमें स्थित राशि के स्वामी को दशमेश ,राज्येश,कर्मेश कहा जाता है | इस भाव से कर्म,व्यवसाय ,व्यापार,यश-मान,सफलता-असफलता,पिता,राज्य,सरकार,सरकारी नौकरी,पदवी, राजयोग ,पारितोषिक ,विदेश यात्रा ,हवाई यात्रा ,अधिकार,राजनीति,घुटना आदि का विचार किया जाता है |

ग्यारहवां भाव ( 11thhouse)

ग्यारहवें भाव को आय ,लाभ कहा गया है जिसमें स्थित राशि के स्वामी को एकादशेश ,लाभेश या आयेश कहा जाता है | इस भाव से  व्यवसाय से होने वाली आय,लाभ ,सुख ऐश्वर्य के साधन, पिता और राज्य से मिलने वाला धन ,पुत्रवधू और  दामाद  ,घुटने से पैर तक टांग का भाग  ,कान आदि का विचार किया जाता है |

बारहवां भाव ( 12thhouse)

बारहवें भाव को व्यय तथा हानि कहा गया है जिसमें स्थित राशि के स्वामी  को द्वादशेश तथा व्ययेश कहा जाता है |इस भाव से सभी प्रकार के व्यय,हानि ,प्रवास,पतन,निद्रा,राजदंड ,परदेश गमन ,भोग,मोक्ष, बायाँ नेत्र,पैर ,चाचा- बुआ ,पुत्र या पुत्री की आयु ,पति –पत्नी के  रोग आदि का विचार किया जाता है |

भावों की केन्द्र आदि संज्ञा

केन्द्र

पहले ,चौथे ,सातवें और दसवें भाव को केन्द्र कहा जाता है तथा इनके स्वामियों अर्थात इनमें  स्थित राशियों के स्वामियों को केन्द्रेश अथवा केन्द्राधिपति कहा जाता है |

त्रिकोण

पहले ,पांचवें ,नवेँ भाव को त्रिकोण कहा जाता है तथा इनके स्वामियों अर्थात इनमें  स्थित राशियों के स्वामियों को त्रिकोणेश कहा जाता है | लग्न अर्थात पहला भाव केन्द्र भी है और त्रिकोण भी |

केन्द्र और त्रिकोण में स्थित ग्रह बलवान और शुभकारक होते हैं |

त्रिक

छ्टे ,आठवें और बारहवें भाव को त्रिक कहा जाता है तथा इनके स्वामियों को त्रिकेश कहा जाता है | त्रिक में स्थित ग्रह तथा त्रिकेश अशुभ फल देने वाले होते हैं |

उपचय

तीसरा ,छटा ,दसवां ,ग्यारहवां  भाव उपचय कहलाता है | इसमें स्थित बलवान ग्रह वृद्धि कारक होते हैं |

मारक

दूसरा और सातवाँ भाव मारक कहलाता है | इन भावों के स्वामी मारक कहलाते हैं जो अपनी दशा-अन्तर्दशा में मृत्यु कारक होते हैं |

( अगले अंक में नव ग्रहों के विषय में विस्तार से वर्णन किया जाएगा | पाठकों से अनुरोध है की इस लेख के विषय में अपने विचार तथा सुझाव अवश्य प्रेषित करें और इस लेख को अपने मित्रों के साथ अधिक से अधिक शेयर करें |)

 कृष्ण कान्त भारद्वाज

लेखक एवम ज्योतिर्विद

91-9416346682

kant.krishan@gmail.com

http//astropoint.wordpress.com//

About kantkrishan

I have written many books on astrology like 1 Janam kundli Phalit Darpan 2 Prashan Phal Nirnay 3 Brihat Jyotish Gian 4 VimshottaryIDasha Phal Nirnay all from Manoj publications Burari Delhi. My articles on predictive astrology have been published in many renowned magzines like Kalyan( Gorakhpur),kadambni etc. I have started a new sereies' falit jyotish ka saral gyan ' on my this blog for the people who have keen interest in predictive vaidic astrology.My services are available online for analysis of horoscopes,match-making,Muhurat and other fields related to astrology I am also available on Tweet http://vaidicastrology.twitter.com/
यह प्रविष्टि ज्योतिष शास्त्र से सम्बंधित विभिन्न शोध पूर्ण लेख में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

फलित ज्योतिष का सरल ज्ञान को 2 उत्तर

  1. kantkrishan कहते हैं:

    जो ग्रह पंचम भाव में स्थित होते हैं उनमें जो बलवान हो उस से सम्बंधित देवता को इष्ट मान कर पूजा अर्चना करनी चाहिए । कोई ग्रह पंचम भाव में न हो तो जो बली ग्रह पंचम भाव को देखता हो उस से सम्बंधित देवता को इष्ट मान कर पूजा चाहिए । कोई ग्रह पंचम भाव को देखता भी न हो तो पंचमेश और पंचमेश के नवांशेश में बलवान ग्रह को इष्ट मानने से सिद्धि होती है

  2. Khushbu Malpani कहते हैं:

    Namste sir.ek curiosity he ki pacham bhav IAST dev ka pata kese chalta he

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